श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”
(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का हिन्दी बाल -साहित्य एवं हिन्दी साहित्य की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 ₹51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य” के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख – “बच्चों की नजर बदलिए, नजरिया बदल जाएगा”।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २५० ☆
☆ आलेख – बच्चों की नजर बदलिए, नजरिया बदल जाएगा ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆
“कल से प्रार्थना सभा में एक लड़के को एक कहानी सुनानी होगी। ” शिक्षक ने यह कहा मगर पहले दिन एक ही लड़के ने नाम लिखवाया। दूसरे दिन प्रार्थना सभा में पहले लड़के ने कहानी सुनाई। तब दूसरा बोल उठा, ” सर! मैं भी कहानी सुना सकता हूं?”
” हां। क्यों नहीं,” शिक्षक ने कहा और लड़के ने कहानी सुना दी।
तीसरे दिन 5 बच्चे कहानी सुनाने के लिए तैयार हो गए। अंतत शिक्षक को कहना पड़ा, ” एक दिन में तीन से ज्यादा लड़के कहानी नहीं सुनाएंगे। “
बच्चों को स्वप्रेरित कीजिए—
बच्चे एक दूसरे से हौड़ करते हैं। उन्हें एक दूसरे से बढ़-चढ़कर काम करने में मजा आता है। यह स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है। इसे हम स्वप्रेरणा भी कह सकते हैं। जिसकी वजह से बच्चे बढ़-चढ़कर कहानी सुनाने में भाग लेने लगे थे।
इस स्वप्रेरणा की बदौलत बच्चे अगले दिन से पुस्तकों में से कहानी ढूंढने लगे थे। कुछ माता-पिता से कहानी सुनकर आते। धीरे-धीरे बच्चों में एक से बढ़कर एक कहानी सुनाने की होड़ होने लगने लगी। जो बेहतर कहानी सुनाता उसे शिक्षक शाबाशी देते। हरेक बच्चे की कहानी सुनाने की किसी ना किसी बात की शिक्षक प्रशंसा करते। इससे सभी बच्चे स्व प्रेरित हो रहे थे।
इस तरह प्रार्थना सभा में कहानी सुनाने का सिलसिला प्रारंभ हो गया। इसका असर यह हुआ कि जो बच्चे पढ़ना-लिखना भी नहीं जानते थे वे कहानी सुनाने में बढ़-चढ़कर भाग लेने लगे।
उन्हें पुस्तकालय तक स्वतः ले जाइए—
कुछ बच्चे तो स्वयं पुस्तकालय में जाने लगे। कुछ बच्चों ने शुरु-शुरु प्रश्न किया था, ” सरजी! कहानी कहां मिलेगी ? हम भी सुनाना चाहते हैं,” तब शिक्षक ने कहा, ” अपनी पाठ्यपुस्तक में या पुस्तकालय की किसी पुस्तक में मिलेगी। चाहो तो मम्मी-पापा या दादा-दादी से भी कहानी सुनकर यहां सुना सकते हो। “
बचे हुए बच्चे शिक्षक की इस प्रेरणा से पुस्तकालय तक पहुंचने लगे। उन्हें यह नहीं कहना पड़ा कि तुम पुस्तकालय की पुस्तकें पढ़ो। वह स्वयं पुस्तकालय की पुस्तकें टटोलने व पढ़ने लगे। उन्हें अब पढ़ने में मजा आने लगा था। क्योंकि उन्हें एक-दूसरे से बेहतर कहानी प्रार्थना सभा में सुनानी थी।
बच्चों में प्रतियोगिता करवाइए—
कौन बढ़िया कहानी सुना सकता है? जैसे प्रश्न उन्हें प्रतियोगिता के लिए उकसाते हैं। तब वे स्वयं ही एक दूसरे से प्रतियोगिता करने लगते हैं। एक छात्र ने अच्छे हाव-भाव के साथ कहानी सुनाई तो दूसरा उससे अच्छे हाव-भाव के साथ कहानी सुनाने की चेष्टा करता है। यही स्वत: चलने वाली प्रक्रिया है। प्रार्थना सभा में इसकी होड़ को आसानी से देखा जा सकता है।
मोहल्ले को आनंद का मैदान बनाइए—
शाम के समय मोहल्ले में इस तरह की गतिविधियां कराई जा सकती है। कभी चुटकुले प्रतियोगिता रखी जा सकती है। बच्चे चुटकुले ढूंढने या पढ़ने के लिए किताबों का सहारा ले सकते हैं। ऐसे समय पर प्रतियोगिता स्थल पर कुछ पुस्तकें, अखबार, चुटकुले की पुस्तकें रखी जा सकती है। आधे घंटे का यह कार्यक्रम मोहल्ले को आनंद से भर सकता है। बच्चों में उत्साह और संचार के लिए बहुत ही बढ़िया गतिविधि है।
बच्चों का कवि सम्मेलन करें—
आप साप्ताहिक या मासिक रूप से इस गतिविधि का आयोजन किया जा सकता है। किसी भी कवि की रचना या कविता उसके नाम सहित सुनाना होगी। यह शर्त रखी जा सकती है। मोहल्ले के दो चार व्यक्ति को जज बनाया जा सकता है। प्रतियोगिता में पांच ₹ का प्रवेश शुल्क लिया जा सकता है। यह एकत्रित शुल्क प्रतियोगिता इनाम के तौर पर विजेता को भी दिया जा सकता है।
सुंदर लेखन प्रतियोगिता करवाएं—
हर बार अलग-अलग प्रतियोगिता करवाने से रोचकता व उत्साह बना रहता है। कभी सुंदर-लेखन प्रतियोगिता करवाई जा सकती है। इसमें सबसे सुंदर लिखने वाले को विजेता घोषित किया जा सकता है। कभी आप श्रुत-लेखन प्रतियोगिता करवा सकते हैं। इसमें सबसे अच्छे अक्षर, जिसमें कम से कम गलती हो उसे विजेता घोषित कर सकते हैं।
नाटक का आयोजन करवाएं—
बच्चों को नाटक के लिए तैयार करें। उनसे कहे- उनके लिए नाटक प्रतियोगिता आयोजन किया जा रहा है। उन्हीं में से एक निर्देशक बनाएं। वही अपना काम निभाए।
इस तरह अलग-अलग प्रतियोगिता करवाई जा सकती है। इन सब बातों से बच्चों की नजर बदल जाएगी। पांच-छह माह इसे करके देखिए। उसका नजरिया बदल जाएगा। तब आप यह कभी नहीं कहेंगे कि बच्चे पढ़ने से दूर हो रहे हैं। बस, पहल आपको करनी है। चाहे आप रचनाकार हो, शिक्षक हो, माता-पिता हो या अभिभावक हो। तब देखिए आप कहेंगे कि बालक पढ़ने से दूर नहीं हुए हैं आपने उन्हें पढ़ने से दूर कर दिया था।
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© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”
17-04-2021
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