श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। । साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य  शृंखला में आज प्रस्तुत हैं  मानवीय संवेदनशील रिश्तों पर आधारित एक अतिसुन्दर एवं सार्थक लघुकथा  “भीगे रिश्ते।  इस सार्थक  एवं  संवेदनशील लघुकथा के लिए श्रीमती सिद्धेश्वरी जी को हार्दिक बधाई।

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी  का साहित्य # 62 ☆

☆ लघुकथा – भीगे रिश्ते

 विरोचनी बहुत प्यार करती थी अपने भैया से। न मां जाई और नहीं राखी का बंधन। परंतु जब से गांव से विवाह होकर आई थी, पति के खास दोस्त प्रधान से उसका भाई बहन का रिश्ता बन चुका था।

प्रधान पति देव का एक मात्र खास दोस्त पहली बार जब वह विरोचनी के घर आया।  वह अनायास ही वह देखती रह गई।

क्योंकि वही कद काठी वही मिलती-जुलती सूरत। जैसे उसका अपना भाई गांव में है। विरोचनी ने उसे भैया… कहा और बोली….. शायद सबसे दूर अपने गांव से यहां मुझे आपके रूप में  भाई मिल गया।

बहुत मित्रता थी श्रीकांत और प्रधान में। एक साथ आना – जाना। हमेशा दुख – सुख में शामिल होना। कभी-कभी तो ऐसा होता था कि पति- पत्नी के झगड़ों में भी प्रधान ही निपटारा करता था।

श्रीकांत भी अपने दोहरे रिश्ते से खुश था, क्योंकि विरोचनी को बहुत प्यार करता था। उसे लगता था उसे अपने भाई के रूप में उसका दोस्त मिल गया है।

प्रधान भैया अपने पारिवारिक कारणों की वजह से विवाह नहीं किए थे। और ना ही करना चाहते थे।

दोनों दोस्तों में बहुत ज्यादा प्यार था। सप्ताह में एक दिन ऑफिस से प्रधान विरोचनी और उनके दोनों छोटे बच्चों के लिए कुछ ना कुछ जरूर लेकर आता था। कभी बारिश में भीग जाए तो श्रीकांत के कपड़े पहन कर चला जाता था। कभी जरूरत पड़े तो श्रीकांत प्रधान के घर पर ही खाना खाकर आ जाता था।

ऑफिस में कुछ दिनों से लगातार उठा-पटक चल रही थी। किसी बात को लेकर बड़े अधिकारी के बीच श्रीकांत की अच्छी खासी बहस चल पड़ी। परंतु प्रधान देखता रहा कुछ भी नहीं बोला। इस बात से श्रीकांत थोड़ा चिढ़ गया और और दोस्तों के बीच मनमुटाव हो गया।

आना-जाना बंद, बातचीत बिल्कुल बंद। विरोचनी कभी अपने पति से पूछती…. कि भैया क्यों नहीं आ रहे हैं?? वह कह देता…. आजकल ऑफिस में काम बहुत हो गया है शायद इसलिए समय नहीं निकाल पा रहा।

एक दिन अचानक अस्पताल में प्रधान और श्रीकांत – विरोचनी की मुलाकात हो गई। बहन ने भैया को देखते ही कहा…. आप घर क्यों नहीं आ रहे हैं? घर आइए मैं जल्दी में हूँ, बाकी बातें घर पर होंगी। परंतु दोस्तों के बीच कोई संवाद नहीं था।

एक दिन बहुत जोरों की बारिश हो रही थी। सर से पांव तक प्रधान भैया भीगे हुए घर आए। विरोचनी ने देखा खुश होकर दरवाजे से बोली…. अंदर आइए परंतु प्रधान ने बहाना बनाया और बोला… मैं बारिश में बहुत भीगा हुआ हूं। फर्श गीला खराब हो जायेगा। यह बच्चों का सामान और एक पॉलिथीन में कुछ खाने का पैकेट लेकर दे दिया और जाने लगे।

विरोचनी ने उसके हाव-भाव को देखकर कहा… आज सचमुच आप बारिश से भीगे हैं। अभी तक आप रिश्ते से भीगे थे।

पलट कर वापस जाने की प्रधान की हिम्मत नहीं हुई। बरसाती पहने पहने ही वह अंदर आकर कुर्सी पर बैठ गया और कह उठा… मुझे माफ करना बहन। कमरे के अंदर श्रीकांत पेपर पढ़ रहा था। आवाज सुन बाहर आ गया और बोला.. दोस्त भीगे फर्क तो अभी सूख जाएंगे।और साफ भी हो जायेगा। परंतु अभी तक जो मन सूख रहा था उसे तुमने फिर से खींचकर हरा-भरा गिला कर दिया।

विरोचनी को कुछ समझ नहीं आया। श्रीकांत ने ठहाके लगाते हुए कहा.. भैया आए हैं गरमा गरम पकोड़े और चाय का इंतजाम करो। अभी लाई.. और फिर हँसी गूँज उठी।

 

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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