श्री अरुण कुमार दुबे
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “आँखों से मेरी वो कभी मंज़र नहीं गया…“)
☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १४७ ☆
आँखों से मेरी वो कभी मंज़र नहीं गया… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆
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तन्हाइयों से मेरी वो मिलकर नहीं गया
उसके बगैर मैं भी कोई मर नहीं गया
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बैठा था बादशाह नया तख़्त पे कोई
बस कोरनिश बजाने कलंदर नहीं गया
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बँटबारे में वतन के मैं बेघर हुआ था जब
आँखों से मेरी वो कभी मंज़र नहीं गया
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दीवार छत किबाड़ हैं केवल नहीं यकीं
इसको ही घर कहें तो कभी घर नहीं गया
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तक़रीर कर रहा वही दुनिया जहान पर
घर से निकल के जो कभी बाहर नहीं गया
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उजले लिवास में है अभी सिर्फ वो बशर
सत्ता की कोठरी के जो अंदर नहीं गया
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बे-लौस है बशर वो उसे कैसे हम कहें
अपने का गैर का अभी अंतर नहीं गया
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वो घुड़सवारी में न महारत को पा सके
गिरने का उसके दिल से अगर डर नहीं गया
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पगड़ी गिरा के जान बचाकर तू आया क्यों
लानत अरुण है तुझको तेरा सर नहीं गया
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© श्री अरुण कुमार दुबे
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