सुश्री निर्देश निधि

आज प्रस्तुत है हिंदी साहित्य की सशक्त युवा हस्ताक्षर सुश्री निर्देश निधि  जी की एक और कालजयी रचना  “दे जाना उजास वसंत”।  मैं निःशब्द हूँ और स्तब्ध भी हूँ। गांव की मिटटी की सौंधी खुशबू से सराबोर हैं एक एक शब्द । संभवतः इसी लिए निःशब्द हूँ  । सुश्री निर्देश निधि जी की रचनाओं के सन्दर्भ में कुछ लिखना सूर्य को दीपक दिखाने के समान है। उनके एक-एक शब्द इतना कुछ कह जाते हैं कि मेरी लेखनी थम जाती है। आदरणीया की लेखनी को सादर नमन।

ऐसी कालजयी रचना को हमारे विश्वभर के पाठकों  तक पहुंचाने के लिए हम आदरणीय  कैप्टन प्रवीण रघुवंशी जी के सहयोग के लिए ह्रदय से आभारी हैं। कैप्टन प्रवीण रघुवंशी न केवल हिंदी और अंग्रेज़ी में प्रवीण हैं, बल्कि उर्दू और संस्कृत में भी अच्छा-खासा दखल रखते हैं. उन्होंने हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए इस कालजयी रचना का अंग्रेजी अनुवाद उपलब्ध कराया है जिसे आज के अंक में आप निम्न लिंक पर भी पढ़ सकते हैं। )

आप सुश्री निर्देश निधि जी की अन्य  कालजयी रचनाएँ निम्न लिंक पर पढ़ सकते हैं :

  1. सुनो स्त्रियों
  2. महानगर की काया पर चाँद
  3. शेष विहार 
  4. नदी नीलकंठ नहीं होती 
  5. झांनवाद्दन

☆ दे जाना उजास वसंत ☆

 

तुम्हें देखा है कई बार वसंत

फूलों वाली बगिया में टहलते हुए

सूनी टहनियों पर चुपचाप

मासूम पत्तियाँ सिलते हुए

अनमने हो गए जी को आशा की ऊर्जा पिलाते हुए

बड़े प्यारे लगे मुझे तुम

 

जोहड़ की ढाँग पर तैरती गुनगुनी धूप में

घास के पोरुए सहलाते हुए

मेहमान परिन्दों के कंठ से फूटते हो सुर सम्राट से

 

पर सुनो वसंत

इस बरस तुम संवर जाना हमारे खेतों में बालियों का गहना बनकर

वरना खाली रह जाएंगे कुठले अनाज के

और माँ को लगभग हर साँझ ही भूख नहीं होगी

और नहीं दे पाएगी एक चिंदिया भी मेरी धौली बछिया को

 

तुम झूल जाना इस बरस आम के पेड़ों की फुनगियों पर ज़रूर

जीजी के तय पड़े ब्याह की तारीख पक्की कर जाना अगेती सी

उसकी आँखों के इंतज़ार को हराकर,

तुम उनमें खिल उठना वसंत

मेरे भैया के खाली बस्ते में ज़रूर कुलबुलाना

नई – नई पोथियां बन

 

सुनो बसंत,

सूखी धूप पी रही है कई बरसों से

मेरे बाबू जी की पगड़ी का रंग

तुम खिले – खिले रंगों की एक पिचकारी

उस पर ज़रूर मार जाना वसंत

 

पिछले बरस तुम नहीं फिरे थे हमारे खेतों में

मेरी दादी की खुली एड़ियों में

चुभ गए थे कितने ही निर्मम गोखरू

 

कितनी ही बार कसमसा दी थी चाची

पड़ौसन की लटकती झुमकियों में उलझकर

हो गया था चकनाचूर सपना चाचा का

मशीन वाली साइकिल पर फर्राटा भरने का

इस बरस मेरे दादा जी की

बुझी – बुझी आँखों में दे जाना पली भर उजास

वरना बेमाने होगा तुम्हारा धरती पर आना

निर्मम होगा हमारे आँगन से बतियाये बगैर ही

हमारे गलियारे से गुज़र जाना

 

मैं थकने लगती हूँ साँझ पड़े

महसूस कर चुपचाप अपने घर की थकन

पर तुम किसी से कहना मत वसंत

वरना माँ जल उठेगी चिंता में

जीजी की तरह मेरे भी सयानी हो जाने की ।

 

संपर्क – निर्देश निधि , द्वारा – डॉ प्रमोद निधि , विद्या भवन , कचहरी रोड , बुलंदशहर , (उप्र) पिन – 203001

ईमेल – nirdesh.nidhi@gmail.com

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Shaili Saksena
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बहुत सुंदर कविता! मेघदूत सा कितना कहा गया बसन्त से।