डॉ अमिताभ शंकर राय चौधरी
(डॉ अमिताभ शंकर राय चौधरी जी एक संवेदनशील एवं सुप्रसिद्ध साहित्यकार के अतिरिक्त वरिष्ठ चिकित्सक के रूप में समाज को अपनी सेवाओं दे रहे हैं। अब तक आपकी चार पुस्तकें (दो हिंदी तथा एक अंग्रेजी और एक बांग्ला भाषा में ) प्रकाशित हो चुकी हैं। आपकी रचनाओं का अंग्रेजी, उड़िया, मराठी और गुजराती भाषाओं में अनुवाद हो चुकाहै। आप ‘कथाबिंब ‘ द्वारा ‘कमलेश्वर स्मृति कथा पुरस्कार (2013, 2017 और 2019) से पुरस्कृत हैं एवं महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा द्वारा “हिंदी सेवी सम्मान “ से सम्मानित हैं।)
☆ आलेख ☆ काशी की रामलीला ☆ डॉ अमिताभ शंकर राय चौधरी ☆
(‘सबसे बुरा होता है हमारे सपनों का मर जाना !’- कथाकार संजीव (गिरेबान में झाँकने की जरूरत:ः बहुवचन: अक्टूबर-दिसंबर. 2016)
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ईश्वरगंगी – हाँ, यही नाम है इस पोखरे का। वामन शिवराम आप्टे ने ‘ईश’ के अर्थ में लिखा है – राज्य करना, स्वामी होना, शासन करना आदि, और ‘ईश्वर’ का अर्थ है – 1.शक्तिसम्पन्न 2.दौलतमंद 3.पति ४. परमेश्वर 5.कामदेव और 6.शिव (संस्कृत हिन्दी कोश)। राणाप्रसाद शर्मा ने पौराणिक कोश में ईश्वर के ये अर्थ दिये हैं -महेश्वर या शिव। वैसे काशी तो शिव की नगरी है ही। और शिव ने ही स्वर्ग से धरा पर तेज रफ्तार से उतरती गंगा को अपनी जटा में सँभाल लिया था। यह कथा तो सभी को मालूम है। यहाँ बनारस में गंगा उत्तरवाहिनी हंै, यानी दक्षिण की ओर न जाकर उत्तर की ओर बहती हैं। तो लोकमन में यही आस्था रही होगी कि ईश्वरगंगी के पोखरे में स्नान करने से गंगा नहाने का पुण्य मिलता है, मगर अब तो…….। खैर….
आज शाम यहीं होगा राम केवट संवाद। सरोवर के चारों ओर पुराने मुहल्लों के मकान एक दूसरे के कंधे से कंधे भिड़ाकर खड़े हैं। उत्तर और पश्चिम तट डाँगरों के कब्जे में। पोखरे के घाट कहीं पक्के हैं, तो कहीं सिर्फ मिट्टी से बने हैं। देखते देखते तालाब के इर्द गिर्द सँकरे रास्तों पर लोक लहरें आकर मचलने लगती हैं। कहीं गोलगप्पे के ठेले लगेे हैं, तो कहीं रास्ते के किनारे कपड़ों पर चिउड़ा और रेवड़ी की दुकाने सजी हैं। गुब्बारेवाले हाथ में फिरकी घुमाते हुए घूम रहे हैं। किसी बालक की आँखें उड़ते गुब्बारों के संग हवाबाजी करने लगती हैं, तो कोई आधुनिक बच्चा अपनी माता का हाथ खींचते हुए अपना माडर्न डिमांड पेश कर रहा है,‘ए मम्मी, हम्मे उ मोबाइल दिला दे !’ एकाध जगह शिव, काली, बंदर, हनुमान और राक्षसों के मुखौटे बिक रहे हैं। एक जमाने में तो कागज की लुगदी से बने मुखौटे ही बिकते थे। आज तो सत्यानाशी प्लास्टिक सर्वव्यापी है। किस तरह यहाँ की एक लोक कला और एक घरेलू उद्योग अपनी आखिरी साँस ले रहे हैं आप इसका भी एहसास कर सकते हैं।
घाट पर एक नाव आकर लगती है। नौका में रंग रोेगन हुआ है, उसे खूब सजाया गया है। हाथों में धनुष वाण लिये वनवासी के भेस में घाट पर खड़े हैं दो छोटे बालक – राम और लक्ष्मण। उनके सिर पर है जटा, माथे पर तिलक और गले में माला। उनकी बगल में उसी तरह खड़ी है नन्ही जानकी। कबहुँ नहिं यहि भाँति देख्यो, आज को सो रंग (-सूर)! अब तीनों को गंगापार जाना है। राम निशादराज गुह यानी केवट को बुलाते हैं।
ज्यों तीनों नाव पर बैठने जाते हैं, केवट ने हाथ जोड़ लिये,‘प्रभु, एक विनती है।’
राम पूछते हैं कि भाई क्या बात है ?
इतने में लीला का ‘व्यास’जी यानी कथावाचक रामचरितमानस के अयोध्याकाण्ड से लीला सम्बन्धित चैपाइयों को पढ़ने लगते हैं,‘ चरन कमल रज कहुँ सबु कहई। मानुश करनि मूरि कछु अहई।।’ प्रभु, सभी कहते हैं कि तुम्हारे चरणकमलों की धूल में कोई ऐसी जड़ी है जिससे कोई बेजान वस्तु भी इन्सान बन जाती है। क्योंकि …….
‘छुअत सिला भइ नारि सुहाई। पाहन तें न काठ कठिनाई।। तरनिउ मुनि घरिनी होइ जाई। बाट परइ मोरि नाव उड़ाई।।
’आपके चरणस्पर्श से तो एक पत्थर भी सुंदरी बन गया था। मेरी नाव तो बस काठ की है, वह तो पत्थर जितनी सख्त भी नहीं है। कहीं वो भी किसी मुनि की घरवाली बन कर फुर्र हो जाये तो मैं तो लुट जाऊँगा!’
यानी केवट पहले राम लक्ष्मण और सीता के चरण धोना चाहते हैं फिर उन्हें अपनी नाव पर बैठायेंगे।
इसी तरह से काशी के भिन्न भिन्न मुहल्लों में मानस के एक एक अंश की लीला ‘अभिनीत’ होती रहती है। किसी दिन दिन अगर ईश्वरगंगी में राम केवट संवाद की लीला चल रही होती है, तो उसी दिन हो सकता है रामनगर में सूर्पनखा की नाक काटने वाली घटना को दर्शाया जा रहा है और भोजूबीर में चित्रकूट में भरद्वाज मुनि के साथ उन तीनों की भेंट की लीला सम्पन्न हो रही हो।
काशी की लोक-कलाओं एवं लोक-संस्कृति में रामलीला का अपना अनूठा स्थान रहा है। पर इसे अभिनय मात्र न समझे। इस संदर्भ में काशी के विशिश्ट संस्कृति कर्मी डा0 भानुशंकर मेहता का वक्तव्य भी काबिले गौर है,‘….‘लीला’ में नाटक मत ढूँढ़ो। यह तो ‘वृत्तांत दर्शन’ है, लोक वृत्तानुकरण है, धार्मिक अनुष्ठान है, जीवन का अनुदर्शक है और सर्वोपरि, ‘भावानुकीर्तन’ है। ….लीला में पात्र अभिनय नहीं करते – भूमिकाएं जीते हैं।’ ( आजकल:ःफरवरी 2006)
ध्यान देनेवाली बात यह भी है कि आज के इस राम केवट संवाद में स्वयम् ईश्वरगंगी पोखरे को भी एक रोल मिला हुआ है। वह गंगा के चरित्र में यहाँ उपस्थित है। गंग सकल मुद मंगल मूला। सब सुख करनि हरनि सब सूला।। समस्त आनन्द और मंगलों के मूल गंगा है। वे सबको सुखी करती हैं और हर पीड़ा हर लेती हैं।
रामलीला आरम्भ होने के बाद आज यह पंद्रहवी संध्या है। प्रतिवर्ष अनन्त चतुर्दशी से यह लीला शुरू हो जाती है। और हाँ, परंपरा के अनुसार बालकांड के 175 दोहे चैपाई जिनका लीलारूप में मंचन नहीं किया जाता, उन्हें अनन्त चतुर्दशी के पहले गायन कर रस्म पूरी की जाती है। इसके लिए रामायणियों के उत्साह में कभी कोई कमी नहीं रहती। भादो कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी पर गणेश पूजन के बाद से वे रामनगर के चैक स्थित रामलीला पक्की पर बैठे उन दोहे चैपाइयों का गायन करते हैं।
काशी में गंगा के उस पार स्थित है रामनगर का दुर्ग। वहाँ रहते हैं काशी नरेश। वे हर साल रामलीला के समय गोधूली वेला में हाथी पर बैठ कर जनता के सामने आते हैं। इसके बाद षुरू होती है रामलीला – गंगा के इस पार एवं उस पार। 2013 में वहीं एक विशेष घटना घटी थी। राजा जिस हाथी पर सवार होकर आनेवाले थे, उसका कोई लाइसेन्स नहीं था। चूँकि इसतरह किसी बेजबान प्राणी को तकलीफ देना अनुचित है, इस आधार पर आदि विश्वेश्वर मंदिर का महन्त शिवशंकर मिश्र ने वन विभाग में शिकायत की थी। नतीजा यह हुआ कि हाथी पर राजा की सवारी दो दिन के लिए टल गयी थी (प्रमोद यादव – दैनिक जागरण 20.9.13)।
कहते हैं काशी में रामलीला का शुभारंभ करनेवाले थे एक वैष्णव, नारायण दास ‘मेघाभगत’। वाल्मीकि रामायण पर आधारित यह लीला संभवतः सन् 1543 में शुरू हुई होगी। मानस की रचना तो उसके बाद यानी 1574 में हुई थी। रामनगर की रामलीला का शुभारंभ 1830 में हुआ था, और काशी की रामलीला 472 साल पुरानी है। चित्रकूट, असीघाट और रामनगर की लीलाओं को ही काशी में प्रमुख माना जाता है।
पर एक प्रचलित कथा यह भी है कि गोस्वामीजी ने ही नारायण का नामकरण किया था – मेघा भगत। कवि के महाप्रयाण के समय वे इतना व्याकुल हो उठे थे कि आत्महत्या की बात सोचने लगे थे। तुलसीदास ने उनको समझाया और सान्त्वना दी। उनसे कहा कि अपनी जीवन नैया को भक्ति एवं निष्ठां के डाँड़ से खेने का प्रयास करो! संत के महाप्रयाण के बाद अन्न जल त्याग कर विलाप करते हुए वे जा पहुँचे अयोध्या। वहाँ स्वप्न में दो बालकों के रूप मंे उनको देव दर्शन हुआ, और वहाँ से लौटकर उन्होंने चित्रकूट की रामलीला का शुभारम्भ किया। (प्रो. राममोहन पाठक:ः आजकल. फरवरी 2006)
इन मेलों में कभी लाखों की भीड़ इकठ्ठी होती थी। इसीलिए इनको ‘लक्खी मेले’ नाम से अभिहित किया गया है। लोक जीवन में स्वाभाविक रूप से इन मेलों का अलग महत्व होता था। बड़े बूढ़ों से लेकर महिलायें एवं बच्चे – इनमें सभी की हिस्सेदारी होती थी। वे दर्शक तो थे ही, भक्त भी थे और कभी राम बारात का अंश या कभी जनक सभा में सभासद भी होते थे। इन्हीं मेलों में छोटे छोटे दुकानदार अपनी जिन्स लेकर पहुँचते थे। उनका भी कारोबार चलता था। लोग आपस में मिलते जुलते थे। वैसे अब बहुत कुछ बदल चुका है। फिर भी चेतगंज के नक्कटैया के मेले में घर आये मेहमानों की खातिरदारी के लिए घरवालों को पहले से बंदोबस्त करना पड़ता है। चूँकि मेला भले शाम तक षुरू हो जाए, पर लक्ष्मण के द्वारा सूर्पणखा की नाक कटते कटते आधी रात बीत ही जाती है, तो मेहमान उतनी रात अपने घर कैसे वापस जायेंगे? सो उनके खाने एवं ठहरने का प्रबन्ध तो अनिवार्य ही हो जाता है।
नक्कटैया के मेले के जलूस में तरह तरह से सजावट भी होती है। जैसे चित्रकूट की कुटिया के सामने राम, लक्ष्मण और सीता बैठे हैं – ऐसे दृष्यों का स्वांग या झाँकी बनाकर दूर दूर से लोेग आते हैं। फिर लाग और विमान। इनमंे पवनपुत्र द्वारा उड़कर मेघनाद के शक्तिवाण लगने से मूर्छित लक्ष्मण के लिए विषल्या या विषल्यकरणी यानी संजीवन बूटी लेने जाने का दृश्य या ऐसा ही कुछ रहता है। इसमें जो लड़का पवनपुत्र बना होता है, उसे तार के सहारे एक लोहे के स्टैंड से लटका कर रखा जाता है। उसी हालत में उसे घंटों लटके रहना पड़ता है। उधर कहीं अगर राम की वानर सेना की झाँकी प्रस्तुत की गयी है, तो अंगदादि के मुखौटे लगाकर पूरे मेकअप के साथ कई पात्र राम लक्ष्मण के पास खड़े रहते हैं।
अब जरा इस पर भी गौर फरमाइये। लोक संस्कृति की एक अनुपम ताकत होती है इसकी सम्प्रेषणीयता। कथ्य, भाश्य एवं वाचन की दृश्टि से यह जनता जनार्दन के बिलकुल नजदीक होती है। यद्यपि घटनाओं को दर्शाते समय इनमंे कोई अनपेक्षित क्राइसिस, कैथार्सिस या कथानक की सीढ़ी चढ़ने के उपरान्त कोई अनजाना क्लाइमैक्स नहीं होता, फिर भी दर्शक मंडली उसकी जानी पहचानी कहानी में ही भाव विभोर हो उठती है। उदाहरण के लिए जरा सोचिए – वन गमन के समय दर्शक यह जानता है कि आगे क्या होने वाला है, दशरथ का कौन सा हष्र होने जा रहा है, फिर भी वह हर साल जानकी की पीड़ा से, बेटे से बिछुड़ने के कारण राजा दशरथ के हाहाकार से द्रवित हो जाता है। आखिर क्यों ? यहीं पर जनता की बोली, उसकी भाशा, परंपरा, भावनायें, धार्मिक विश्वास, उसका समाज, उसकी परवरिश आदि हर एक का प्रभाव उस पर परिलक्षित होने लगता है।
इसी बात को जरा और आगे बढ़ायें तो आप पाइयेगा कि भिन्न भिन्न समय में हमारी आजादी की लड़ाई में भी लोक संस्कृति या इन मेलों ने एक महत्वपूर्ण रोल अदा किया था। बंगाल के चारण कवि मुकुंद दास ऐसे मेलों में जाकर ही गाया करते थे,‘ हे बंगबालायें, अपनी कलाइयों से इन रेशमी चूड़ियों को फेंक दो! हे जननी, हे भगिनी, अब जागो!’ उसी तरह आदिवासी लड़ाकू नेता बिरसा मुंडा ने घोषणा की थी कि अब रावण का लंकाराज (यानी अंग्रेजी राज) खतम करने का वक्त आ गया है। मंदोदरी (इंग्लैंड की रानी) की मूर्ति को अब जला देना है! (बिरसा मुंडा:ः के.एस.सिंह. पृ.45)
और 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के बाद इन झाँकियों में ‘खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसीवाली रानी थी’ या फाँसी के तख्ते पर चढ़ते तात्या टोपे या अन्य विद्रोहियों की झाँकी भी शामिल की गयी। केवल सीधी व्यंजना नहीं, वरन व्यंग या वक्रोक्ति के जरिए भी अपनी बात कह दी जाती थी। जेम्स् प्रिन्सेप ने ‘बनारस इलस्ट्रेटेड’ में लिखा है सन् 1825 में जो रावण सेना बनायी गयी थी, उनमें बदन पर जैकेट पहने एवं सफेद मुखौटा लगाये ढेर सारे ‘राक्षस’ थे। तो इशारा किस तरफ था? हाँ, प्रिन्सेप्स साहब ने इस बारे में ‘कौनो काॅमेंट’ नहीं किया है। अक्लमंद के लिए इशारा काफी होता है। (फेस्टिवल आॅफ रामलीला)
फिर 1920 के लवण सत्याग्रह या विदेशी कपड़ों की होली को लेकर भी इन मेलों में झाँकी या स्वाॅग की रचना की गयी। आगे चलकर भगत सिंह, सुखदेव एवं राजगुरू भी इनमें किरदार के रूप में उपस्थित हो गये। फिर दूसरी सामाजिक समस्यायों पर भी इसी तरह टिप्पणी की गयी। मंदिरों में हरिजनों का प्रवेश हो, दहेज के लिए बहुओं की प्रताड़णा, उन पर जुल्म बंद हो – इन विषयों पर भी लाग या झाँकी की रचना हुई। यानी धार्मिक तत्व के अलावा अपने सामाजिक उत्तरदायित्व का भी इन मेलांे ने भरसक निर्वाह किया।
‘‘लीला का अनूठा पक्ष है उसका उद्देष्य, उसका प्रयोजन!’ डा0 भानुशंकर अपनी बात को इस तरह आगे बढ़ाते हैं, ‘श्रीमद्भागवत के अनुसार:- जीवस्य यः संसरतो विमोक्षणं/ न जानतोऽनर्थ वहच्छरीरतः/ लीलावतारैः स्वयश प्रदीपकं/ प्राज्वालयत्वा तमहं प्रपद्ये।
लीला का उद्देश्य है समाज-कल्याण, मानव मात्र का कल्याण, सबके लिए सुख-समृद्धि, सुख-शांति के लिए आयोजित अनुष्ठान। आधुनिक नाटक में अवसाद है, त्रासदी है, कैथार्सिस है, नहीं है तो सर्वमंगल, सर्वेभवन्तु सुखिनः की कामना।’ (आजकल – वही)
हाँ, तो साहबजान मेहरबान, रामलीला की झाँकी महिमा प्रस्तुत करते हुए मेरी कलम-लीला भी अब समापन की ओर अग्रसर है। मगर रात का ध्रुव तारा भी जब निष्प्रभ होने लगे तो लोक-संस्कृति एवं लोक-विरासत के बारे में कोशी मिथिला अंचल के रमेश कुमार का बयान भी जरा सुन लीजिए, ‘किसी भी लोक-कला, लोक-शिल्प, लोक-तकनीक के पतन की पहली शर्त है कि वह अपने लोगों के बीच में ही अपना कलात्मक महत्व को खो दे।’ (ककसाड़ – दिसंबर. 2016)
और हाँ, पर्दा गिरने से पहले यह भी तो सोचें कि आखिर एक ‘मेला’ मर क्यों जाता है? आप अगर बट-बाबा को ही काट डालिएगा, तो मेला होगा किस मैदान में ? आप अगर खनिज सम्पदा के खनन के नाम पर या तथा कथित विकास के लिए मेले वाली जमीन ही हथिया लीजिएगा, तो मेेला होगा कौने ठाँई? भले ही आप उन अभागे अशिक्षितों को उनकी जमीन की ‘कीमत’(?) अदा कर दें, मगर उनकी आगे की पीढ़ी कहाँ जायेगी? कहाँ बसेगी? क्या खायेगी? अपने बीवी बच्चों को क्या खिलायेगी? क्या आपको मालूम भी है कि इतनी बड़ी एवं निर्मम ‘नर्मदा-रामायण’ के बाद किसको कितना मुआवजा मिला? नर्मदा बचाओ आंदोलन के बारे मेें तो आपने सुना ही है। वहीं धोलेरा स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट से प्रभावित 22 गांवों के लोगों ने अहमदाबाद के लिए प्रस्तावित नहरों के लिए सरदार सरोवर प्रोजेक्ट के डिनोटिफिकेशन का विरोध किया था। आखिर नर्मदा का वह पानी गुजरात के किसानों के खेतों की प्यास नहीं बुझा रहा है, वो तो किसी नयी नगरी के निर्माण में ‘कामगार’ बन गया है (प्रीती सम्पत: दि हिन्दू 1.2.2017.)। तो ? जन ही रह नहीं जायेगा तो जन-संस्कृति के दीये जलायेगा कौन ?
रवीन्द्रनाथ ने अपने आलेखों में कई जगह (कालान्तर मंे ‘छोटो ओ बड़ो’, ‘वातायनिकेर पत्र’, फिर राजा प्रजाः समूह में ‘विरोधमूलक आदर्श’ आदि) एक ऋशि वाक्य को दोहराया है:-
अधर्मेनैधते तावत् ततो भद्राणि पश्यति,/ ततः सपत्नान् जयति समूलस्तु विनश्यति।
इसको अगर यूँ कहें:- अधर्म के जरिए कुछ लोग तो ‘बड़े आदमी’ बन जाते हैं, अधर्म में ही वे अपना कल्याण देखने लगते हैं, अधर्म से वे अपने शत्रुओं पर भी विजय प्राप्त कर लेते हैं, परंतु आखिर जड़ से ही उनका विनाश होता है।
लोक-चेतना, लोक-दृश्टि और लोक-संस्कृति के रक्षकों को भी यह नहीं भूलना चाहिए कि ‘अपनी सीता’ को पाने के लिए स्वयम् राम को जंग-ए-लंका लड़नी पड़ी थी। ‘सिंहासन’ ने पांडवांे को बिना युद्ध के सूच्यग्र मेदिनी देने से भी इनकार कर दिया था। अपने ‘हक’ के लिए उनको लड़ना पड़ा कुरुक्षेत्र का समर।
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© डॉ. अमिताभ शंकर राय चौधरी
पताः फ्लैट नं. 301, चौथी मंजिल, टावर नं 1, मंगलम आनन्दा ग्रैंड रामपुरा रोड, सांगानेर, जयपुर, 302029
मो. 9455168359, 9140214489. ईमेल: asrc.vns@gmail.com
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈







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