श्री जगत सिंह बिष्ट
(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)
🏔️ हिमालय में 7,500 ग्लेशियर झीलें 🌱
🏔️ हिमालय में 7,500 ग्लेशियर झीलें—क्या 189/195 झीलें कभी भी फट सकती हैं?
🇳🇵 नेपाल की त्रासदी से सबक, लेकिन घबराहट नहीं
नेपाल में हुई भीषण हिमालयी त्रासदी ने स्वाभाविक रूप से पूरे हिमालय को लेकर चिंता बढ़ा दी है। इसी बीच एक प्रमुख अखबार की यह सुर्खी सामने आई—
“चिंता… देश में 189 ग्लेशियर झीलें फटने की स्थिति में, पूरे हिमालय में 7500 ऐसी झीलें।”
सुर्खी निश्चित ही डर पैदा करती है। लेकिन क्या वास्तविक स्थिति इतनी भयावह है?
थोड़ा तथ्य समझना उपयोगी होगा। 🔍
🏔️ 7,500 का मतलब क्या है?
भारतीय हिमालय में हजारों छोटी-बड़ी ग्लेशियल झीलें हैं। National Remote Sensing Centre (NRSC) ने उपग्रहों की सहायता से 7,500 से अधिक ग्लेशियल झीलों को मैप किया है। ये 7,500 ऐसी झीलें नहीं हैं जिन्हें सरकार ने “फटने के कगार पर” माना है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, भारतीय हिमालयी क्षेत्र में कुल संख्या इससे भी काफी अधिक—लगभग 28,000 ग्लेशियल झीलों—की है। 7,500 का आंकड़ा उन झीलों से सम्बद्ध है जिन्हें उपग्रह आधारित अध्ययन में चिन्हित/मैप किया गया है।
🚨 फिर 189 या 195 का क्या अर्थ है?
यहीं पर समाचार की सुर्खी और वास्तविकता के बीच फर्क समझना जरूरी है।
NDMA ने विभिन्न वैज्ञानिक आंकड़ों, उपग्रह चित्रों और अन्य अध्ययनों को मिलाकर जोखिम-प्रधान झीलों की एक dynamic list तैयार की है।
2024 में इस सूची में 195 high-risk glacial lakes थीं। इससे पहले 189 का आंकड़ा प्रचलित था। अर्थात् 189 कोई “189 झीलें अभी फटने वाली हैं” वाली संख्या नहीं थी।
और high-risk का अर्थ “किसी भी क्षण फटने वाली” भी नहीं है।
इसका अर्थ है कि इन झीलों में ऐसे जोखिम-संकेत पाए गए हैं—जैसे क्षेत्रफल में तेजी से वृद्धि—जिनके कारण इनके संभावित GLOF (Glacial Lake Outburst Flood) का वैज्ञानिक आकलन और जोखिम-निवारण प्राथमिकता से किया जाना चाहिए।
🛰️ क्या सरकार केवल आंकड़े गिन रही है?
नहीं।
सरकार ने इस खतरे को गंभीरता से लेते हुए National Glacial Lake Outburst Flood Risk Mitigation Programme (NGRMP) शुरू किया है। इसके अन्तर्गत high-risk झीलों का ground assessment, जलस्तर और मौसम की निगरानी, bathymetric surveys, early-warning systems तथा आवश्यकता के अनुसार झील का जलस्तर कम करने जैसे उपाय किए जा रहे हैं।
Central Water Commission भी हिमालयी क्षेत्र में बड़ी ग्लेशियल झीलों और जल निकायों की नियमित निगरानी करता है और GLOF के लिए अधिक संवेदनशील अवधि में monitoring bulletins जारी करता है।
🇳🇵 नेपाल की त्रासदी हमें क्या बताती है?
नेपाल में हुई हालिया आपदा को केवल यह कहकर समझना भी सही नहीं होगा कि “एक ग्लेशियर झील फट गई और बाढ़ आ गई।”
उपलब्ध प्रारम्भिक वैज्ञानिक आकलनों के अनुसार, वहां glacier/ice-rock collapse और debris flow की cascading घटना ने नदी में अचानक अत्यन्त शक्तिशाली बाढ़ पैदा की। अर्थात् हिमालयी खतरे अनेक रूपों में सामने आ सकते हैं—glacial lake outburst, glacier collapse, landslide, debris flow अथवा प्राकृतिक अवरोध टूटने के रूप में।
🌡️ फिर असली चिंता क्या है?
चिंता जरूर है—लेकिन घबराने की नहीं, जागरूक होने की।
बढ़ते तापमान, ग्लेशियरों के पीछे हटने और कुछ ग्लेशियल झीलों के विस्तार से हिमालय की प्राकृतिक अस्थिरता बढ़ सकती है। इसलिए वैज्ञानिक निगरानी, early-warning systems, downstream hazard mapping, स्थानीय समुदायों की तैयारी और संवेदनशील क्षेत्रों में अनियंत्रित निर्माण पर सावधानी अत्यन्त आवश्यक है।
लेकिन “हिमालय में 7,500 झीलें हैं और 189 कभी भी फट सकती हैं” कहना उपलब्ध सरकारी आंकड़ों का सही अर्थ नहीं है।
🌱 सही निष्कर्ष
न तो खतरे को नकारना समझदारी है,
न ही आंकड़ों को सनसनी में बदलना।
हिमालय हमें चेतावनी दे रहा है कि प्रकृति के साथ खिलवाड़ की गुंजाइश कम होती जा रही है। इसका उत्तर डर फैलाना नहीं, बल्कि विज्ञान, सतर्कता, बेहतर आपदा-प्रबंधन और पर्यावरण-सम्मत विकास है।
🏔️ हिमालय को डर की नजर से नहीं,
समझ और सम्मान की नजर से देखने का समय है।
🌿 जागरूक रहें। घबराएँ नहीं।
प्रकृति को समझें—और उसकी सीमाओं का सम्मान करें।
प्रस्तुति: जगत सिंह बिष्ट 🪷
© श्री जगत सिंह बिष्ट
साधक
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≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’≈





