श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव 

गोरखपुर, उत्तर प्रदेश की निवासी लेखिका व कवयित्री श्रीमती अभिलाषा श्रीवास्तव जी एक प्रेरणादायक महिला हैं। साहित्य की सेवा में निरंतर रत | आपको 2024 में अंतरराष्ट्रीय महिला सम्मान पत्र से नवाजा गया। विशेष सम्मान : एक्सीलेंट कवयित्री अवार्ड से सम्मानित तथा पुरस्कृत |उनके द्वारा संवाद टीवी पर फाग प्रसारण में प्रस्तुत किया गया और विभिन्न राज्यों के प्रमुख अखबारों व पत्रिकाओं में उनकी कविता, कहानी और आलेख प्रकाशित हो चुके हैं। उनकी लेखनी में समाज के प्रति संवेदनशीलता और सृजनात्मकता का सुंदर संगम देखने को मिलता है।

☆ आलेख ☆ दो शब्द अतंस के – आशिर्वाद और मृगतृष्णा ☆ श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव ☆

जीवन की पदयात्रा में बहुत कुछ पीछे छूट गया।

कुछ वक़्त ने उपहार स्वरूप दिया।

उन उपहारों में सबसे कीमती उपहार मेरी सेहत है क्योंकि एक वक्त ऐसा भी आया जब कहने- सुनने के लिए बेहड भीड़ थी परन्तु बेहद भीड़ से बेहतरीन नाम कोई भी उगलियों पे गिनने पर नहीं आया जो उस वक़्त मेरे पास और सिरहाने पे खड़ा हो कर एक शब्द बोला हो

मैं हूँ न✍️

जिदंगी ने यह सिखाया- पढ़ाया और छलावा भरी भीड़ से निकाल कर केवल उस मिट्टी पर मुझे लगाया जहाँ से केवल एक ही आवाज़ आती थी और वह आवाज थी परमात्मा की जिसे किसी ने देखा नहीं फिर भी अनुभूति हुई कि एक पल में बिखरने से कोई रोक सकता है तो केवल आत्मशक्ति और उसी शक्ति में छुपे हुए हैं प्रभु का प्रभाव बाकी अध्ययन केवल शून्य।।

आध्यात्मिक व धार्मिक होना अलग- अलग बात है।

मैं, दोनों ही नहीं हूँ क्योंकि अध्यात्मिक शिव में समाहित होता है और धार्मिक प्रभु मुर्ति प्रेम में,  मैं, ठहरी खुदगर्ज एक गृहस्थी में डूबीं हुई गृहणी जिसके पन्नों में नमक की नमी से लेकर बच्चों की खवाहिशें तक समेटनी होती हैं।

अनकहे – अनदेखी दरारें जिसे उपर बढियां सा फोटो फ्रेम से छुपाया जा सकें उन जज्बात को जो मचलते तो थे लेकिन तोड़ दिए गए केवल इस लिए कि उसने घर के सबसे छोटे स्तंभ को चुना था खुद के लिए।

और समेटने होतें हैं गांधारी की उस पट्टी को भी जो बांधने के बाद भी वह मोह से दूर नहीं जा सकीं और तोड़ दिया उन्होंने मौन संवाद अपने ही बगीचे में।

लकीरों में बहुत कुछ होने के साथ भी बहुत कुछ नहीं होता है बिलकुल महाभारत की बराबरी के जैसे जिस को उस गलती की सज़ा मिली जो उसने किया ही नहीं और सब कुछ समाप्ति के साथ मिला केवल एक आशिर्वाद??

वैसे ही मेरे पास केवल एक आशिर्वाद है बाकी सब कुछ एक छलावा।

एक आशिर्वाद और मृगतृष्णा में जैसे कैद हो गईं वे सारी उम्मीदें जो मेरी थी लेकिन मेधा के बादल के जैसे- छीन लिया गया।

उससे तमाम उम्र की यौवन भरी बूंद को और सृष्टि उस पर अधिकार जमाने के साथ- साथ अंगारे बरसाती हूई आंखें दिखाती हूई बोले –

‘तेरे भाग्य में यही है’

खैर कृष्ण की भक्त हूँ लेकिन, रणछोड़ नहीं हूँ नीति- राजनीति छल- कपट से दूर केवल एक भावुकता से परिपूर्ण स्त्री हूँ जो केवल इतना जानती है, सारा खेल महत्वाकांक्षा का हैं। अत: उसी महत्वाकांक्षा ने किसी को कैकेयी तो किसी को यशोदा बनाया अब हमारे उपर है, हम नियति से क्या लेते हैं और अपने बच्चों के लिये क्या छोड़कर जाते हैं क्योंकि न ही कैकेयी और ना ही यशोदा माता कुछ भी लेकर गई।

बस स्मृति छोड़ गई वही स्मृति हमें पुण्य- आत्मा व धार्मिक बनाता है।

जीवन का सबसे बड़ा धन जो है पास और मुट्ठी बंद हो या खुली साथ जायेगा, वह है केवल कर्म।

आज उम्र के एक मनका और जुड़ने के बाद कुछ शब्द खुद के लिए खर्च करती हूँ

शायद यह पल दोबारा मिले या ना मिले#

कर्म की खेतीबाड़ी व मानवता का बीज केवल शून्य हृदय से ही किया जा सकता है क्योंकि जिस हृदय में प्रपंच भरा हुआ होगा वह केवल भीष्म बनेगें द्रोणाचार्य बनेगें किन्तु एकलव्य बनने के लिए आत्मशक्ति- आत्मशांति चाहिए जो केवल प्रभु स्तुति में है। कोई फर्क नहीं पड़ता आप के पास क्या है क्योंकि चार कंधे भी नही मिलतें है अक्सर शोहरत वाले को और कबीर के लिए कोई धर्म बचा नहीं तर्पण मुक्ति के लिए। अतः अति नहीं केवल आरंभ कीजिये केवल नेकी भरे अतंस से छलावा से केवल छल मिलेगा मुक्ति नही।

© श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव

गोरखपुर, उत्तरप्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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