श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # १६  ☆

☆ कथा-कहानी ☆ ~ सच पिता बड़ी छतरी होता ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

बाबूजी आपकी यादों का, एक सुन्दर सा  महल  बनाता  हूँ l

कविता, लिखता, कविता पढ़ता, कविता में इसे सजाता हूँ ll

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माना  माँ  का  स्थान  बड़ा, माँ  जन्माती, दुलराती  है l

गा गा कर लोरी सुना सुना, थपकी दे हमें सुलाती है ll

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एक बात हृदयसे कहता हूँ, तेरा बेटा हूँ, यह कह इतराता हूँ l

बाबूजी आपकी यादों का, एक  सुन्दर  सा महल बनाता हूँ ll

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आँखों  में  प्यार  उमड़ता  है, ममता हँसती  इतराती  है l

मेरी हर हरकत सह करके, माँ मुझ पर प्यार लुटाती है ll

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गोदी माँ की फूलों सी है, पर अंगुली पिता की धरता हूँ l

बाबूजी आपकी यादों का, एक सुन्दर सा महल बनाता हूँ ll

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इस तारे को सूर्य बनाने में, जीवन को खपा दिया तुमने l

हे पिता पसीना बहा बहा, एक सागर बना दिया तुमने ll

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तेरे   इस  बड़े  समुन्दर  में, जीवन  जलयान  चलाता    हूँ l

बाबूजी आपकी यादों का, एक सुन्दर सा महल बनाता हूँ ll

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है  याद  मुझे  वह  सुन्दर  पल, उस भाप के  इंजन  की गाडी l

हर प्रश्नों का उत्तर पूछूँ, तुझको साहलाकर, खुजलाकर दाढ़ी ll

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मेरे  हर  प्रश्नों  के  उत्तर  थे, इसके  संग  धाक जमाता हूँ l

बाबूजी आपकी यादों का, एक सुन्दर सा महल बनाता हूँ ll

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मेरे  भविष्य  की  चिंता  को, तेरा  ललाट  बतलाता  था l

हर ख़ुशी और गम का खांका, तेरे माथे खींच जाता था ll

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अपनी  इस  सुघर  हवेली  का, तुमको  आधार  बताता हूँ l

बाबूजी आपकी यादों का, एक सुन्दर सा महल बनाता हूँ ll

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तुम देव लोक को चले गए, एक भव्य लोक को बना दिया l

 क्यारी  में  जल  दे  दे  करके, फूल  अनोखा खिला दिया ll

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सच  पिता  बड़ी  छतरी  होता, जिसके नीचे छिप जाता हूँ l

बाबूजी आपकी यादों का, एक सुन्दर सा महल बनाता हूँ ll

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सम्मान पिता का करता जो, सम्मान जगत में पाता है l

आदर्श पुत्र कहलाता है, वह सबके दिल  को  भाता है ll

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अपनी इस छोटी रचना  का,  इसे  सार  तत्व बतलाता हूँ l

बाबूजी आपकी यादों का, एक सुन्दर सा महल बनाता हूँ ll

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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