श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “परिचय अपरिचय…“।)
अभी अभी # १०१४ ⇒ आलेख – परिचय अपरिचय
श्री प्रदीप शर्मा
अजनबी, तुम जाने पहचाने से लगते हो !
अपरिचय से ही परिचय का जन्म होता है । पहचान ही परिचय है । बच्चे बिना परिचय के ही पहचान कर लेते हैं । हमारा परिचय नाम से होता है लेकिन प्रकृति में पहचान रंग और खुशबू से होती है, आँखों देखी से होती है । अगर हमें पशु पक्षियों की भाषा आती तो क्या हम उनसे उनका नाम पूछते और वे बेचारे क्या जवाब देते । बहुत कुछ रहस्य प्रकृति अपने गर्भ में छुपाकर रखती है,क्योंकि हम केवल इंसानों की भाषा जानते हैं,प्रकृति की नहीं ।
मनुष्य ने पहले अपनी एक अलग पहचान बनाई ,अभिव्यक्ति हेतु भाषा और व्याकरण का आविष्कार किया । अंधा बांटे रेवड़ी,पहले अपना नाम इंसान रख लिया और कुत्ते को कुत्ता और गधे को गधे का नाम दे दिया । और तो और उसने ही भगवान को भी एक नाम दिया । शेक्सपीयर कह तो गए कि गुलाब तो गुलाब ही रहेगा,उसे किसी भी नाम से पुकारा जाए,लेकिन अपना नाम बदलना भूल गए ।।
जानने और पहचानने में अंतर होता है ! कई बार ऐसे अपरिचित चेहरे सामने आ जाते हैं,और प्रश्न कर बैठते हैं,पहचाना ? आप अगर मुंहफट हुए तो मना भी कर सकते हैं और अगर शालीन हुए तो यही कहेंगे,कहीं देखा तो जरूर है,लेकिन याद नहीं आ रहा । वे आपको कुछ पुरानी घटनाएं याद दिलाने की कोशिश करते हैं और आप अनायास कह उठते हैं,अरे आप तो हमारे पुराने पड़ोसी हैं,अब याद आया । बहुत दिनों बाद आपको देखा । कितना बदल गया न सब कुछ इस बीच ।
विशिष्ट व्यक्ति याने सेलिब्रिटीज को ही ले लीजिए,उन्हें कौन नहीं जानता ! लेकिन क्या वे हर एक को व्यक्तिगत रूप से पहचान सकते हैं । मोदी जी का लोगों ने चेहरा देखा है,आवाज भी सुनी है,कई ने साक्षात दर्शन भी किए होंगे,लेकिन क्या वे आपसे रुबरू होने पर आपको पहचान सकते हैं ? कतई नहीं ! क्योंकि जान-पहचान पारस्परिक होती है । It’s a two way traffic. जब तक आप किसी से मिलते नहीं,आपस में संवाद नहीं होता,हम एक दूसरे को नहीं जान सकते । जान – पहचान इतनी आसान भी नहीं होती ।।
फिल्म आनंद में जॉनी वाकर का एक किरदार था,वे रास्ते में चलते हुए किसी भी अजनबी व्यक्ति को रोककर पूछ लेते थे,अरे जयचंद कैसे हो ? वह अजनबी एकदम सकपका जाता और जवाब देता, मैं जयचंद नहीं हूं,गुलाबचंद हूं । जॉनी भाई उसकी पीठ पर एक धौल जमाते हुए कहते,तो अच्छा नाम भी बदल लिया ।अपरिचय का दायरा तोड़कर परिचय के संसार में प्रवेश करना इतना आसान भी नहीं होता ।
हम आखिर किसी को जान ही कितना पाते हैं । एक समय था जब नौकरियों के लिए चरित्र प्रमाण पत्र मांगा जाता था । कोई विशिष्ट अथवा प्रमुख व्यक्ति अंग्रेजी में प्रमाणित करते थे ;
I know him since last ten years. He bears a good moral character. I wish him every success in life.आज भी वैक्सीन के मेरे प्रोविविजन सर्टिफिकेट पर मोदीजी की तस्वीर है । पहचान जरूरी है । कहीं आधार कार्ड,कहीं पैन कार्ड ,कहीं पासपोर्ट ,तो कहीं बी .पी. एल.कार्ड । पहचान नहीं,तो आदमी इंसान नहीं ।।
हम ईश्वर को कितना जानते हैं,और ईश्वर हमें कितना जानता है । हम जिसे नहीं जानते,और जो हमें नहीं जानता,उसका भी अस्तित्व होता है,ठीक उसी प्रकार,जैसे हम अपने आपको कितना जानते हैं,पहचानते हैं,फिर भी दंभ भरते हैं,हम किसी से कम नहीं । हम से है जमाना ।
हमें हाथ नहीं लगाना । वर्ना पड़ेगा पछताना ।
पहले किताबों से परिचय हुआ,बाद में फेसबुक के जरिये फेसबुक फ्रेंड्स से परिचय हुआ ! अपरिचय में सब कुछ अजाना,अस्तित्वविहीन रहता ही है,परिचय में जिज्ञासा होती है,बहुत कुछ जानने की लालसा होती है । जब जिज्ञासा शांत हो जाती है,तब जानने के लिए कुछ बाकी नहीं रह जाता । अगर दिल के तार जुड़ गए,सार्थक संवाद कायम हो गया,तो समझिए , जीवन में एक और खूबसूरत दोस्त का प्रवेश हो गया,अन्यथा परिचय को ढोते रहने से अच्छा उससे छुटकारा पा लिया जाए और अखबारों की रद्दी की तरह छंटनी शुरू हो जाती है ।।
लोग दीवाली की सफाई की तरह फेसबुक की सफाई करते हैं । जब हम अपने चेहरे को साफ सुथरा रखते हैं,तो फेसबुक को क्यों नहीं रखें । एक मछली सारे तालाब को गंदा करती है । बड़े प्यार से फेसबुक का फिश पॉट तैयार किया था । रंग बिरंगी मछलियों से उसे सजाया था ।फेसबुक हमारी पहचान है,हमारा परिचय है ।
अधिक और अनावश्यक परिचय से अपरिचय बेहतर है । अपरिचय में राग द्वेष,स्वार्थ और खुदगर्जी नहीं होती । परिचय की जड़ों में अगर प्रेम के बीज हों,तो पौधा पनपता है । अब तो बेलि फैल गई ,आनंद फल होई ।।
© श्री प्रदीप शर्मा
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