श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “बीज भंडार।)

?अभी अभी # १०१८ ⇒ आलेख –  बीज भंडार  ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

मेरे शहर में खादी भंडार, अखंड औषधि भंडार, दयाल भंडार और महालक्ष्मी वस्त्र भंडार की तरह कई बीज भंडार भी हैं। पहले हमारे घरों में भंडार गृह भी होते थे, जिनमें वर्ष भर का अनाज और राशन सुरक्षित रखा जाता था।

हमारा यही भंडार अंग्रेजी का स्टोअर्स है, जो घिस घिस कर स्टोर्स हो गया है। किराना के आगे स्टोर्स तो ऐसे लग जाता है, जैसे किसी इंजन के पीछे रेल के डिब्बे। हमारा बाजार भंडार, स्टोर्स, हाउस और सेंटर से भरा पड़ा है। भैया स्टोर्स पर किताबें और स्टेशनरी का भंडार है तो आड़ा बाजार के कंगन स्टार्स पर महिलाओं के श्रृंगार का सामान। इंदौर ग्लास हाउस कोई कांच का घर नहीं, लेकिन वहां कांच ही कांच है। कैफे सेंटर में अगर चाय कॉफी और नाश्ता उपलब्ध है तो गणेश कैप मार्ट पर महिलाओं की भीड़ ही भीड़।

किसानों और बागवानी के शौकीनों के लिए शहर के नंदलालपुरा में आज भी कई बीज की दुकानें हैं। हर दुकान के नाम में बीज भंडार आप आसानी से पढ़ सकते हैं। बीज में कितनी शक्ति है, यह जानकर बड़ा आश्चर्य होता है। आज जो बीज यहां दुकान पर सुरक्षित रखा है, अगर उसे समय और मौसम के अनुकूल, उचित खाद और मिट्टी के सुपुर्द कर दिया जाए तो एक पौधा तैयार हो जाता है। खेत में फसल लहलहा उठती है, किसान की तकदीर चमक उठती है।।

हमारा शरीर भी महज कोई हाड़ मांस का पुतला नहीं, इसमें ही कहीं गुणों का भंडार है तो कहीं भावनाओं का समुद्र।

मनुष्य को बंडल ऑफ़ हैबिट्स अर्थात आदतों की गठरी भी कहा गया है।

बूंद जो बन गई मोती की तरह ही बीज रूप में सभी कुछ तो हमारे अंदर मौजूद है। जिस बीज को अच्छा पोषण मिलता है, वह पनप कर फलने फूलने लगता है।

मोटे तौर पर हमने इंसान को केवल दो भागों में ही बांटा है, अच्छा और बुरा। अच्छाई के प्रतीक अगर राम कृष्ण हैं तो बुराई के रावण, कंस और दुर्योधन। देवासुर संग्राम क्या अच्छे और बुरे बीजों का आपस में टकराव है। क्या गाजर घास की तरह बुराई के बीज को ही नष्ट नहीं किया जा सकता।।

बीज का एक सिद्धांत है। जो बीज जल जाता है अथवा एक बार उबाल लिया जाता है, आप कितनी भी कोशिश कर लो, उपजाऊ मिट्टी, बढ़िया खाद, हवा पानी कुछ काम नहीं आता। दग्ध बीज कभी नहीं पनपता।

अगर हमारे अंदर पनप रहे बुराई के बीज को जला दिया जाए तो क्या बुराई नष्ट नहीं हो जाएगी। कितना अच्छा हो, इंसानियत के बीज भंडार से अच्छाई का बीज लाया जाए और उसे प्रेम की माटी में सींचा जाए।।

मीरा ने भी तो यही किया था। आंसुओं के जल से प्रेम की बेल को सींचा था और उसे आनंद रूपी फल की प्राप्ति हुई थी। हमारे अंदर के कबीर, मीरा और सहजो कहां चले गए। हमारा प्रेम जनरल स्टोर्स क्यों आउट ऑफ स्टॉक हो गया।

हमारे अंदर के इंसानियत के बीज भंडार का क्या हुआ ? क्या बीज की देखभाल नहीं हुई अथवा बीज को पनपने लायक वातावरण नहीं मिल रहा। राग द्वेष स्वार्थ और नफरत की मिट्टी में क्या प्रेम और इंसानियत का बीज कभी पनपा है। क्या अखंड औषधि भंडार में कोई ऐसी वटी है जो हमारे विकारों का नाश कर सके। कोई ऐसा रसायन जो नकारात्मकता के वायरस का जड़ मूल से सफाया कर सके।।

क्यों न थक हारकर, हमारे त्रिपुरारी शंकर की ही सहायता ली जाए ;

हे नीलकंठ, हे महादेव

ऐसी कृपा अब कर दो।

मेरे मन में जहर भरा है

उसको अमृत कर दो।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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