श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “ज्ञान-गंगा।)

?अभी अभी # १०३४ ⇒ आलेख – ज्ञान-गंगा ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

ज्ञान का गंगा से वही संबंध है, जो संगीत का सरिता का ! सङ्गीत अगर सरिता की तरह कलकल बहता है, तो ज्ञान वह पवित्र धारा है, जिसमें स्नान से अज्ञान रूपी अंधकार दूर होता है।

ज्ञान का कॉपीराइट गंगा को ही क्यूँ ! और भी नदियाँ हैं, वे सब भी पवित्र हैं। कालिंदी, गोदावरी की तो छोड़िए, अमरकंटक से निकली नर्मदा भी किसी से कम नहीं। ठीक है, हिमालय की बेटी है, शिवजी की जटाओं से निकली है, सर्व-गुण-सम्पन्न और लाडली भी तो है। जिस गंगा में स्नान मात्र से समस्त पापों का क्षय हो जाता हो, ज्ञान की गंगा में भी

यही सब गुण समाहित हैं।।

जिस तरह गंगा का उद्गम गंगोत्री है, और विसर्जन गंगासागर में, उसी प्रकार विवेक ज्ञान की गंगोत्री है और ज्ञान की परिणति ज्ञानसागर ! ज्ञान के साथ गुण का जब भी साथ हुआ है, वही तो, “ज्ञान-गुण-सागर” हुआ है।

लंका यूँ ही नहीं लाँघ ली जाती।

गंगा क्यूँ न इतराए, जब वह शिवजी की जटाओं में लहराए !

जिसका कोई आदि न अंत, वह जो आशुतोष अनंत, जिन्हें ध्यावै सभी देव-नर-मुनि-श्रेष्ठ-संत, कैलाशवासी कहलाएं नीलकंठ।

सतगुरु में ज्ञान और गंगा दोनों का वास है। गुरु और गंगा दोनों मोक्ष प्रदान करते हैं। जहाँ ज्ञान, त्याग, वैराग्य, असीम करुणा और संपूर्ण सृष्टि के कल्याण की भावना सनातन रूप से बह रही है, ऐसी गंगा में क्यों न स्नान किया जाय !

धारा सतगुरु !

लेत नहाए क्यों न ?

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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