श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “इतवार के बहाने…“।)
अभी अभी # १०३८ ⇒ आलेख – इतवार के बहाने
श्री प्रदीप शर्मा
हमारी दिनचर्या में वर्ष भर में कई वार त्योहार आते जाते रहते हैं, सूरज रोज निकलता, अस्त होता रहता है, लेकिन सिर्फ रविवार ही एक ऐसा छुट्टी का दिन है, जो हर हफ़्ते आता है, और हमारा संडे का मूड बना जाता है। विदेशों में लोग वीक ऐंड मनाते हैं, हम संडे मनाते हैं।
संडे को ही छुट्टी का दिन क्यूं ?जब कि हमारा तो हर दिन ही सूर्य के उदय होने से शुरू होता है। सुना तो यह भी है कि एक जमाना ऐसा भी था जब अंग्रेजों का साम्राज्य इतना फैला हुआ था कि उनके राज में सूरज अस्त ही नहीं होता था, फिर भी ठंडे प्रदेश में रहने वाले फिरंगी बेचारे धूप को तरस जाते थे, और जिस दिन सूरज निकलता, उस दिन को वे संडे, यानी छुट्टी का दिन घोषित कर देते थे। दिन भर पड़े पड़े धूप खाया करते थे। हमारे धूप स्नान को वे basking कहते हैं।।
सूर्य हमारे लिए देवता है। हमने सूर्य को बारह नाम दिए हैं और जब हर सुबह हम सूर्य नमस्कार करते हैं, तो उसे बारह नामों से स्मरण करते हैं। सवेरे का सूरज हमारे लिए है। हमें सूर्य से ही नहीं, गर्मी से भी विशेष प्रेम है।अंग्रेज तो सिर्फ संडे मनाकर रह गए, हमारे यहां तो गर्मी के मौसम में पूरे स्कूलों की ही छुट्टी हो जाती थी।अंग्रेजों की नानी नहीं होती। हमें नानी के यहां जाने के लिए, विशेष रूप से, गर्मी की छुट्टी दी जाती थी। कहां गए वे दिन !अब तो सात दिनों की बड़े दिनों की छुट्टी देने में इनकी नानी मरती है। भला हो कोरोना बला का, भला हो आपदा में अवसर का।
वैसे हमारा संडे का मूड शनिवार से ही बन जाता है। कुछ लोग इस दिन सूर्यवंशी बन जाते हैं। तानकर सोते हैं। जब तक सूरज, पहले सर पर, और बाद में छाती पर नहीं आ जाता, तब तक सोते रहते हैं। महिलाएं तो ब्यूटी पार्लर चली जाती हैं, पुरुष भी आजकल देखादेखी जेंट्स पार्लर जाने लगा है। पहले तो आपले केश कर्तनालय पर ही केश विन्यास, यानी हजामत हो जाती थी। नाई की जबान कैंची की तरह चलती थी, और केंची जबान की तरह। कई न्यूज चैनल्स का प्रसारण एक ही चैनल पर।।
छुट्टी का दिन बहुत छोटा होता है। सुबह होती है, शाम होती है, छुट्टी यूं ही तमाम होती है।कई दिनों से बाहर का घूमना, खाना, सब बंद है, लॉक डाउन ने जीवन में कई अप्स एंड डाउन्स, बोले तो, उतार चढ़ाव ला दिए, लेकिन जिस तरह सूरज रोज निकलता रहा, हमें विटामिन डी प्रदान करता रहा, हमें ऊर्जा प्रदान करता रहा, पुराने दिन भी लौट आएंगे। हम फिर पहले जैसे संडे मनाएंगे।
सप्ताह में सात दिन हैं और कोई कहता है, जिंदगी के सिर्फ चार दिन हैं। तीन दिन और कम क्यों कर रहे हो भाई साहब ! जिंदगी के पूरे सात दिन हैं। संडे को हम चार्ज होते हैं और फिर पूरे सप्ताह काम पर लग जाते हैं।
यह सिलसिला सदियों से चलता चला आ रहा है, और ऐसे ही चलता रहेगा। हर दिन सुहाना दिन, हर शाम सुहानी शाम।आज की शाम इतवार, तुम्हारे नाम। सूर्य देवता, तुम्हें संडे की सुबह का सलाम, प्रणाम, नमस्कार !
ॐ सूर्याय नमः
ॐ मित्राय नमः
ॐ रवये नम:
ॐ भानवे नमः
ॐ खगाय नमः
ॐ पूष्णे नमः
ॐ हिरण्यगर्भाय नमः
ॐ मारीचाय नम:
ॐ आदित्याय नमः
ॐ सावित्रे नमः
ॐ अर्काय नमः
ॐ भास्कराय नमः
© श्री प्रदीप शर्मा
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