श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “दिव्य मौन …“।)
अभी अभी # १०४६ ⇒ आलेख – दिव्य मौन
श्री प्रदीप शर्मा
हमें भव्य की आदत है, दिव्य की नहीं। भव्य का पड़ोसी आलीशान है।
हमें चमक और जगमगाहट आकृष्ट करती है, मोमबत्ती का प्रकाश नहीं। जो मज़ा हंसते गाते, गुनगुनाते जिंदगी गुजारने में है, वह एकाकी जीवन बिताने में कहां।
किसी की चुप्पी हमें काटने को दौड़ती है, विशेषकर उस व्यक्ति की, जो हमेशा बोलता चालता रहता है, महफिलों को रोशन करते रहता है। दो अंतरंग मित्र अगर बहुत देर से चुपचाप बैठे हों, तो अनायास ही एक कह उठता है, कुछ तो बोलो, कुछ तो बात करो।
कक्षा में छात्र से मास्टर जी द्वारा कोई प्रश्न पूछे जाने पर जब कोई जवाब नहीं मिलता तो मास्टर जी यही कहते नजर आते हैं, कुछ जवाब क्यों नहीं देते, क्या सांप सूंघ गया है।।
बिना बोले रहने की हमें आदत नहीं। ईश्वर ने जबान बोलने को दी है, दो प्रेम के मीठे शब्द बोलने अथवा किसी के हाल चाल पूछने में क्या हमारी जबान घिस जाती है। लानत है ऐसे लोगों पर, जो हर पूछे सवाल का जवाब सिर्फ हां ना में ही देते हैं। इतनी कंजूसी भी किस काम की ! अंदर स्टॉक भरा हो, और जबान पर ताला लगा रखा हो।
किसी से नाराज होने पर हम उससे बात नहीं करते। जा, तोसे नहीं बोलूं कन्हैया, राह चलत, पकड़ी मोरी बैंया। लेकिन यह रूठना मनाना मौन का हिस्सा नहीं होता। जब नाराजी खत्म होती है, तो शिकायतों का अम्बार लग जाता है। कसम, वायदों और माफी के बाद ही मामला सुलझता है।।
मौन एक चित्त की अवस्था है। यह एक प्रकार की साधना भी है। दुख एवं अवसाद के क्षणों में भी हमें किसी से बात करने का मन नहीं होता। कुछ लोग, जब गुस्से में भरे हुए होते हैं तो एकाएक बोलचाल बंद कर देते हैं।
हमारे परिवारों में फूफाजी बहुत बदनाम हैं, बात बात पर गुस्सा करने, बात नहीं करने, और मुंह फुलाने में।
उनको मनाना एक असंतुष्ट नेता को मनाने से भी मुश्किल काम होता है। बहुत भाव खाते हैं अक्सर ये फूफा लोग।
गुस्से के अलावा व्रत के रूप में भी लोग मौन धारण करते हैं। इसे मौन व्रत भी कहते हैं। यह मन और जिव्हा पर संयम के लिए किया जाता है। साधारण लोगों के लिए आसान नहीं होता यह मौन व्रत। चौबीस घंटे फोन पर बात करने वालों के फोन की जब घंटी बजती है, तो एक तरह से उनकी घंटी बज जाती है। जब कभी कभी लगातार घंटी बजती रहती है तो वे आवेश में आकर, फोन उठाकर साफ साफ बोल ही देते हैं, हेलो, देखिए मेरा मौन व्रत चल रहा है। आगे से मुझे फोन ना करें।।
जो अधिक व्यस्त और गणमान्य होते हैं, उनका जब इशारों से काम नहीं चलता तो एक स्लेट अथवा काग़ज़ कलम का सहारा लेना पड़ता है। लोग उनके मौन के कई अर्थ लगा लेते हैं। सरकारें खतरे में पड़ जाती हैं। घर में कोहराम मच जाता है। मौन में भी संवाद कितना जरूरी होता है, यह एक मौन धारण करने वाला ही जान सकता हैं।
आइए, अब दिव्य मौन में चलें ! यहां कोई शब्द नहीं होता, कोई विचार नहीं होता, कोई संकेत अथवा किसी तरह की प्रकट अथवा अप्रकट अभिव्यक्ति नहीं होती। यह केवल बाहरी नहीं, अंतस का भी मौन होता है। अक्सर होता यह है कि हम तो मौन धारण कर लेते हैं, लेकिन हमारा मन तो मुक्त है, वह तो आपसे सतत वार्तालाप करता ही रहता है और मन ही मन आप उसको जवाब भी देते ही रहते हो।।
दिव्य मौन, मन से भी पार जाने की अवस्था है। यहां ना कोई बोलने वाला होता है और ना कोई सुनने वाला। शायद कबीर की इसी आध्यात्मिक अनुभूति को पंडित कुमार गंधर्व ने इस तरह प्रकट किया है ;
सुनता है गुरु ज्ञानी, गुरु ज्ञानी
गगन में आवाज हो रही झीनी झीनी झीनी झीनी
पहिले आए आए पहिले पाए
नाद बिंदु से पीछे जमया पानी पानी हो जी ….
सुनता है गुरु ज्ञानी
कबीर हो अथवा कोई भी दिव्य सत्पुरुष, सभी आध्यात्मिक उपलब्धियां और उपदेश दिव्य मौन में ही प्रकट होते हैं। अंतर्चेतना ही अंतर्गुरु है, बाहरी गुरु तो निमित्त मात्र है। दिव्य मौन का उपदेश ही एक साधक को गुरु पूर्णिमा का उपदेश है।
आइए मन के पार चलें इस गुरु पूर्णिमा पर, बस हम आप और दिव्य मौन।।
संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर
मो 8319180002
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





