श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “भागने/भगाने की कला…“।)
अभी अभी # १०४७ ⇒ आलेख – भागने/भगाने की कला
श्री प्रदीप शर्मा
हम यहाँ उड़नसिख मिल्खा अथवा उड़नपरी पी टी उषा की बात नहीं कर रहे, जो भागने में देश का नाम रोशन कर चुके हैं, हम उस भागने/भगाने का जिक्र कर रहे हैं, जिसे समाज अच्छी निगाह से नहीं देखता।
हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में ऐसे कई मौके आते हैं, जब हमें भागकर सिटी बस, अथवा ट्रेन पकड़नी पड़ती है। कुछ लोग तो स्कूटर पर भी भागते-भागते ऑफिस पहुँचते हैं। आखिर जीवन में दौड़-भाग तो लगी ही रहती है।।
एक समय था, जब कुछ बच्चे बचपन में बिना बताए घर छोड़कर भाग जाते थे ! माँ बाप बेचारे परेशान। अखबारों में इश्तहार देते थे। गुमशुदा की तलाश। बेटा गौरव ! तुम जहाँ कहीं भी हो घर चले आओ। दादीजी ने चार रोज से खाना नहीं खाया है। तुम्हारी माँ का रो-रोकर बुरा हाल है। पैसे की ज़रूरत हो तो बताना। लाने वाले, या पता बताने वाले को उचित ईनाम दिया जाएगा।
वह ज़माना था, जब एक खोया हुआ, या भागा हुआ बच्चा भी सुरक्षित वापस घर आ जाता था। आजकल छोटे बच्चों तक का अपहरण फिरौती वसूलने के लिए किया जाता है। क्या ज़माना आ गया है।।
जितनी छूट आज लड़कियों को है, उतनी हमारे जमाने में नहीं थी। लड़कियों के लिए अलग कन्या विद्यालय और महा-विद्यालय भी था। लड़की सीधी स्कूल जाती थी, और सीधी घर आती थी।
उसकी सहेलियाँ होती थी, बॉय फ्रेंड नहीं। आग लगे इन कॉलेज गर्ल, लव इन शिमला, और लव इन टोकियो जैसी फिल्मों को, जिन्होंने लड़कियों को सिनेमाघर का रास्ता दिखा दिया। एक लड़की भीगी-भागी सी।
फिर भी लड़कियों की हिम्मत नहीं होती थी कि लड़कों की तरह घर से भाग जाए। उनकी दौड़ नानी या मामा के घर तक की ही होती थी और भाई चौवीस घंटे यमदूत की तरह आगे पीछे। बड़ी मुश्किल से कुछ ही लड़कियां किसी लड़के के साथ घर से भाग सकती थी। उन्हें लोग अच्छी लड़की नहीं समझते थे।
फिर समय ने करवट ली। विद्यालय कान्वेंट हो गए, को-एजुकेशन अर्थात सह -शिक्षा प्रारंभ हो गई। स्कूलों में निबंध और वाद-विवाद के लिए एक नया विषय मिल गया। आज के आधुनिक दौर में क्या सह-शिक्षा जरूरी है ? पक्ष हो या विपक्ष, न जाने क्यों, लड़कियाँ ही प्रथम आती थी।।
अब समय बदल गया है। नर्सरी से पीजी तक लड़के-लड़कियां साथ-साथ उठते-बैठते, पढ़ते-लिखते हैं। एक दूसरे को अच्छी तरह समझते हैं। अब उन्हें सड़क अथवा कॉलेज की किसी लड़की को देख सीटी मारने की ज़रूरत नहीं पड़ती। पांडुबा, पोरगी फसली रे फसली जैसे घटिया गानों का ज़माना गया। चाहे माँ रूठे या बाबा, मैंने तेरी बाँह पकड़ ली, जैसा अब कुछ नहीं है। अब लड़के-लड़की घर छोड़कर भागते नहीं, माता-पिता की सहमति से अपना घर बसाते हैं। बच्चे भी समझदार हैं और माता-पिता भी।
आज की पीढ़ी के सामने वैसे ही कई चुनौतियाँ हैं। उनके जीवन में वैसे भी स्थिरता कहाँ ! उन्हें तो भागते ही रहना है, पहले उच्च-शिक्षा के लिए तो बाद में एक अच्छी नौकरी के लिए। उन्हें भी एक ऐसे जीवन साथी को तलाश है जो जीवन की इस भागम-भाग में उनका साथ दे। उन्हें भागकर शादी करने की फुर्सत ही कहाँ है ! माता-पिता थक जाते हैं कहकर, अपनी पसंद का लड़का, अथवा लड़की ही बता दो, ताकि हम अपनी ज़िम्मेदारी से मुक्त हो सकें, और आज की पीढ़ी है कि उसे भागने की तो छोड़िए, घड़ी दो घड़ी, प्यार करने की फुर्सत ही नहीं।।
भागने/भगाने की आदर्श स्थिति भी होती है। शास्त्रों में इसे गंधर्व विवाह कहा गया है ! रुक्मी की बहन रुक्मिणी मंदिर जाने के बहाने श्रीकृष्ण से मिलने नहीं गई, वे तो माँ भवानी से आशीर्वाद लेने गई थी कि उन्हें श्रीकृष्ण ही पत्नी के रूप में वरण करे। और यहाँ तो काजी भी राजी थे।
केवल रुक्मी इस भ्रम में था कि कृष्ण उसकी बहन को भगाकर ले जा रहा है। मर्ज़ी से जाने और भागने में ज़मीन आसमान का अंतर है।
जहाँ प्रेम हो, वहाँ विवाह हो !
हमारी भारतीय नारियाँ तो इतनी समर्पित हैं, कि जहाँ विवाह होता है, वहीं प्रेम कर लेती हैं। बदले में उन्हें क्या मिलता है, यह या तो वे जानें, या फिर रब ही जानें। अगर आप सगाई ही को शादी मान लें तो जगजीत-चित्रा एक आदर्श उदाहरण हैं, जो साथ साथ मिलकर यह घोषणा करते हैं –
सबसे ऊँची, प्रेम सगाई।।
© श्री प्रदीप शर्मा
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