श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “उसकी रोटी…“।)
अभी अभी # १०५० ⇒ आलेख – उसकी रोटी
श्री प्रदीप शर्मा
दीवाना आदमी को बनाती है रोटियाँ ! रोटी तो रोटी होती है। तेरी, मेरी, उसकी रोटी। गर्मागर्म, गोल-मटोल रोटियां। दुनिया के किस कोने में रोटी नहीं खाई जाती। नाम अलग होगा, शक्ल अलग होगी, लेकिन जहां भूख होगी, मेहनत होगी, वहाँ रोटी अवश्य होगी।
रोटी गेहूं की होती है, ज्वार, मक्के, बाजरे, जौ की होती है, रोटी तवे की होती है, तंदूर की होती है, चूल्हे, गैस और स्टोव्ह की रोटी होती है, मोटी पतली, रूखी सूखी, चिकनी चुपड़ी रोटी होती है। कहीं इसे फुलका कहते हैं तो कहीं चपाती। किसी के लिए यह टिक्कड़ है तो किसी के लिए पोळी। कहीं उत्सव है, पूजा त्योहार श्राद्ध है, तो वहां यह पूड़ी है, कहीं पंजाबी परांठा तो कहीं मिस्सी रोटी है। न जाने क्यूं, मुझे अपनी रोटी से उसकी रोटी ज्यादा पसंद है।।
भूख है जहाँ, रोटी है वहां ! जहाँ भूख नहीं, वहाँ रोटी का क्या काम। गुलामी के घी से आज़ादी की घास अच्छी। महाराणा प्रताप जंगलों में घास फूस की रोटियाँ खाते थे। जहाँ पेट भरा हो, अपच हो, कब्जियत हो, अथवा हराम की कमाई हो, वहाँ दाल रोटी को घास फूस ही कहते हैं।
जहाँ पापड़, सलाद, एपिटाइजर और स्टार्टर के बिना भूख ही नहीं लगती हो, वे रोटी का स्वाद ही नहीं जानते। उनकी रोटी रूमाली रोटी होती है, नान होती है, कभी पिज्जा तो कभी बर्गर होती है।
उसकी रोटी मेरी रोटी से स्वादिष्ट कैसे ! जिसके पास मुझसे ज्यादा अभाव है, गरीबी है, मुफलिसी है, मज़बूरी है, भूख है, चैन है, नींद है, प्यास है, मुझे उसकी रोटी अपनी रोटी से ज्यादा प्यारी है। गांव हो या कस्बा, झुग्गी हो या झोपड़ी, आश्रम हो या मठ, बस चूल्हे से उठता हुआ धुआं हो, और तवे पर गर्मागर्म सिकती रोटियां हों, उसकी खुशबू मेरे लिए किसी फूल की महक से कम नहीं। एक फूल जब खिलता है, बस वही उसकी इबादत हो जाती है। साँसों के साथ वह सात्विक भाव मेरी आत्मा के लिए छप्पन भोग का काम करता है। बिन खाए मुझ पे नशा छाया है, तेरी रोटी ने गजब ढाया है।।
हेल्थ हाइजीन एक तरफ, कड़कती भूख एक तरफ। आज भी जब भरी दोपहर को अचानक भूख लग आती है, तो कटोरदान से चुपके से दो ठंडी रोटी निकालता हूं, थोड़ा आम के अचार का मसाला लपेटता हूं, और उसकी पुंगी बना, प्रेम से खाता हूं। उसके बाद जब पानी पीता हूं, तो लगता है, महीनों की भूख प्यास शांत हो गई।
मैं कितना भाग्यशाली हूं, मुझे रोटी के साथ अचार भी नसीब है। मेरी भूख प्यास कायम है, भूख प्यास मिटने के बाद ही चैन की नींद नसीब होती है। ज्यादा की नहीं लालच मुझको, बस हर इंसान को इसी तरह भूख लगने पर मेहनत और ईमानदारी की दो रोटी नसीब हो। कोई मेहनती और ईमानदार इंसान का परिवार भूखा ना सोए, रोटी के कारण उसका ईमान न डोले। ईमान रोटी से नहीं, पैसे की हवस के कारण डोलता है। पैसे वालों के लिए तो बड़े बड़े होटल, रेस्तरां, अस्पताल और डॉक्टर मौजूद हैं ही ;
तुम्हें होटलों के पिज्जा बर्गर मुबारक
हमें उसके चूल्हे की गर्मागर्म रोटी, रास आ गई है।।
© श्री प्रदीप शर्मा
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