श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “स्वर्ग नरक…“।)
अभी अभी # १०६२ ⇒ आलेख – स्वर्ग नरक
श्री प्रदीप शर्मा
कभी कभी ऐसा भी हो जाता है, जिसके बारे में हम सपने में भी नहीं सोचते, उसके सपने में दर्शन हो जाते हैं। मेरे साथ भी कल कुछ ऐसा ही हुआ। मेरे सपने में चार्वाक प्रकट हो गए। जीवन भर अपने पैसों से च्यवनप्राश खाया, लेकिन कभी च्यवन ऋषि ने स्वप्न में आने का कष्ट नहीं किया और जिनके दर्शन और सिद्धांत में मेरी रुचि नहीं, वे स्वप्न में दर्शन दे रहे हैं।
जिनका जीवन दर्शन ही –
यदा जीवेत, सुखं जीवेत्
ऋणं कृत्वा, घृतं पिबेत्
यानी जब तक जीयो, सुख से जीयो, कर्जा करो और घी पीयो, हो उनके लिए कैसा पाप और कैसा पुण्य और कैसा स्वर्ग और नरक। जरूर किंगफिशर माल्या चार्वाक के वंश के ही होंगे। न आसमां में कोई खुदा है और न ही किसी का पुनर्जन्म। जो भी है, बस यही मानस जनम। खाओ, पीयो, कर्जा करो, और मौज करो।।
जो ईश्वर को नहीं मानते, वे ईश्वर से नहीं डरते। उनका ईमान तक कहीं गिरवी रखा होता है। जब मरने के बाद सब मिट्टी में मिल जाना है, नेकी बदी सब, अगर स्वर्ग कहीं है, तो केवल इस धरती पर ही है। ऑनली डिफॉल्टर्स भोग्या वसुन्धरा। इस धरा का पूरी तरह दोहन वही पुरुष कर सकता है जो पाप और पुण्य में भेद नहीं करता हो। जो कथित ईश्वरीय शक्ति के कोप से भयभीत नहीं होता हो। शायद यही चार्वाक दर्शन हो।
जो नास्तिक होते हैं, वे ईश्वर और स्वर्ग नरक को नहीं मानते। लेकिन पाताल के बारे में सब मौन हैं। मरने के बाद कोई पाताल नहीं जाता। इंदौर से कुछ किलोमीटर दूर एक प्राकृतिक झरना है, जिसे पाताल पानी कहते हैं। कहते हैं, उसकी गहराई पाताल तक है। जो उसकी गहराई नापने गए, वे वापस ही नहीं आए। पाताल लोक को सर्प लोक भी कहते हैं।
हमारा नश्वर शरीर का भी धार्मिक मान्यता अनुसार ही अंतिम कर्म किया जाता है। कहीं उसे दाह कर्म के जरिए पंच तत्वों में विलीन किया जाता है तो कहीं उसे दफना दिया जाता है। जिसे ऊपर जाना है, उसे दो गज जमीन के नीचे कयामत तक इंतजार करना पड़ता है। खुदा करे कि कयामत हो और तू आए।।
जो प्रकृति को जाने बिना, केवल अपने स्वार्थवश प्राकृतिक संसाधनों का दुरुपयोग एवं शोषण करते हैं, वे आस्तिक हों या नास्तिक, मानवता के बहुत बड़े शत्रु होते हैं। लेन – देन, give and take, ही जीवन का नियम है। आप अगर समाज से कुछ ले रहे हैं, तो बदले में क्या लौटा रहे हैं। मानव सभ्यता barter system यानी वस्तु विनिमय प्रणाली से ही शुरू हुई थी। तब भी हम इतने खुदगर्ज नहीं थे, जितने आज हैं।
आज जितने भी दर्शन हैं, सब प्रदर्शन की वस्तु बन गए हैं। पोथी पढ़ना और ज्ञान बांटना ! जीवन में जो आत्मसात होता है, अमल में लाया जाता है, वही दर्शन होता है। बाहर से मंदिर प्रदर्शन और मन में चार्वाक दर्शन, अगर इसी तरह चलता रहा, तो स्वर्ग नरक तक कोई पहुंच ही नहीं पाएगा, और कोई नये किंगफिशर और सहाराश्री देश को रसातल की ओर ले जाएंगे। हमारी संस्कृति ने सभी मान्यताओं और दर्शन को सम्मान दिया है। सबकी अच्छाई बुराई सामने है। नीर क्षीर विवेक ही कर्ज़ वाले घी से बेहतर है। दत्तात्रेय समर्थ थे, फिर भी उन्होंने २४ गुरु किये। जिस प्राणी में भी अच्छाई दिखी, उसे अपना गुरु माना। आपका आत्म गुरु आपके अंदर ही है। हम विश्व गुरु की बात नहीं कर रहे। चार्वाक ने हमारी आंखें खोल दी हैं।।
© श्री प्रदीप शर्मा
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