श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “मियाँ की तोड़ी…“।)
अभी अभी # १०७१ ⇒ आलेख – मियाँ की तोड़ी
श्री प्रदीप शर्मा
राजनीति जोड़-तोड़ है, गठ-जोड़ है, तोड़-फोड़ है। राजनीति कुर्सी है, जिस पर बैठकर आसमान सर पर उठा लिया जाता है। संगीत केवल जोड़ है, उसका कोई तोड़ नहीं। सङ्गीत ज़मीन से जुड़ा है, जिसके लिए सदा आसमान अदब से झुका है।
राजनीति में कोई किसी का गुरु नहीं होता ! सङ्गीत में गुरु गुड़ ही रहता है, चेला कभी शक्कर नहीं होता। क्योंकि उसका गुरु, कोई योगगुरु नहीं, उस्ताद होता है।
यह उस्ताद किसी बाबा की तरह तावीज़ और भभूत नहीं, शिष्य को गण्डा बाँधता है, सङ्गीत के ज़रिए उसे ईश्वर से जोड़ता है।।
राजनीति में केवल हिन्दू-मुसलमान होता है, संगीत और अध्यात्म के क्षेत्र में गुरु-शिष्य संबंध होता है। आप भले ही तमाम मुल्क की सराय से मुग़लों को खदेड़ फेंकें, ताजमहल को शिवाला बना दें और कुतुब-मीनार को नेस्तानबूद ही क्यों न कर दें, उस्ताद बिस्मिल्लाह खान से शहनाई अलग नहीं कर सकते, बाप-बेटे उस्ताद अल्ला रक्खा और ज़ाकिर हुसैन से तबले की थाप को जुदा नहीं कर सकते।
अकबर के गले से नवरत्नों की माला नोंच लीजिये, तानसेन की संगीत की दुनिया में आग नहीं लगा सकते, रसखान के पदों में से कृष्ण-भक्ति और बांसुरी की धुन अलहदा नहीं कर सकते।
आत्मा को तो आप अमर समझें और रूह को आप मार नहीं सकते, रानी रूपमती को महान और बाज-बहादुर के प्रेम को लव ज़िहाद का दर्ज़ा दे नहीं सकते। कहाँ कहाँ मज़हबी तोड़-फोड़ करेंगे, मियाँ की तोड़ी को तोड़, सुरों की तान छेड़ नहीं सकते। इस धरती की हरियाली से उसकी हरियाली छीन हरा झंडा और कश्मीर के केसर से उसके केसरिया रंग और खुशबू को मिला केसरिया ध्वज आप भले ही बना लें, उन्हें इस खुले आसमान में साथ-साथ लहराने से किसी को रोक नहीं सकते। चाँद हम सबका है, कभी दूज का, तो कभी चौदहवीं का। सूरज अगर खुशियों की सक्रांति है, तो गुरु पूनम हमारी गुरु पूर्णिमा है। हम सूरज चाँद को मज़हबों में बाँट नहीं सकते।।
जुगलबंदी ही जीवन-संगीत है !
जीवन में कहीं लता का स्वर है तो रफी का गीत। पंडित ओंकारनाथ अगर ठाकुर हैं तो बड़े गुलाम अली खां भी उस्ताद है। रविशंकर के सितार के साथ अल्ला रक्खा के तबले की जुगलबंदी होती है, तो मुँह से वाह ताज ही निकलेगा। मुमताज़ को क्यों बीच में लाते हो।
मियाँ की तोड़ी हो, या राग मेघ मल्हार ! जीवन की इन खुशियों में राग शिवरंजिनी हो, या यमन राग ! जहाँ मालकौंस हो, वहाँ मन तड़फत हरि दर्शन को आज।
कोई भी साज़ हो, कोई भी आवाज़ हो, एक ही रंग, एक ही रूप, बस हो एक ही राग, देस राग।।
© श्री प्रदीप शर्मा
संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर
मो 8319180002
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈




