श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “चिमटा संड्सी…“।)
अभी अभी # १०८१ ⇒ आलेख – चिमटा संड्सी
श्री प्रदीप शर्मा
चिमटा और संड्सी का पूरा जीवन, किसी आदर्श गृहिणी की तरह चौके चूल्हे में ही गुजर जाता है। इन्हें भले ही पर्दे में नहीं रखा जाता हो, लेकिन इन्हें कभी रसोईघर छोड़ने की अनुमति नहीं मिलती। बैठक में तो इनकी परछाई भी प्रवेश नहीं कर सकती। इन्हें अक्सर आग से खेलना पड़ता है।
इनका रसोईघर में वही महत्व होता है जो पिंचिस, पेचकस(स्क्रूड्राइवर) और पाने(प्लायर) का एक मैकेनिक के लिए होता है।
रसोईघर भले ही कोई वर्कशॉप नहीं हो, लेकिन एक पाकशाला तो है ही।।
जब चिमटा छोटा होता है तो उसे चिमटी कहते हैं। अक्सर डिसेक्शन बॉक्स में और घड़ीसाजों के पास घड़ी के छोटे छोटे कलपुर्जों को पकड़ने के लिए चिमटियों का उपयोग होता है, जिसे forcep कहते हैं। बचपन में भाई बहन आपस में, और स्कूल में बच्चे एक दूसरे को च्यूंटी खोड़ते थे। यह एक ऐसी हरकत थी, जिस पर अक्सर किसी तीसरे व्यक्ति का ध्यान नहीं जाता था।
नाम के अनुरूप इसमें चींटी काटने जितना ही दर्द होता था। इसकी शिकायत एक आम समस्या थी।
जहां तवा है, वहां चिमटा है। बिना चिमटे के आग पर रोटी नहीं सिकती। पापड़ भी बिना चिमटे के नहीं सिकता। कितनी बार उलटने पलटने पर पापड़ की बेदाग सिकाई होती है, यह सब कुशल गृहिणी के साथ चिमटे का भी तो कमाल है। शैतान बच्चों के लिए माता का यह प्रिय गर्म अस्त्र बन जाता था जिससे सिर्फ उन्हें डराया जाता था।।
जब चिमटा और बड़ा हो जाता है तो उसे सन्यास ग्रहण करना पड़ता है और वह बाबाओं के हाथ में चला जाता है, तवे की रोटी त्याग इसे अलख जगानी पड़ती है। अलख निरंजन।
संड्सी को कुछ लोग संडासी भी कहते हैं, जो गलत है। वे भूल जाते हैं, मराठी में संडास किसे कहते हैं। हमारी भारतीय महिलाओं का रसोईघर, पूजा घर जितना ही पवित्र और साफ सुथरा होता है। कच्चे घरों में तो रोज रसोई के साथ चूल्हे को भी लीपा जाता था। रसोईघर में जूते चप्पल निषेध थे। तपेली, भगोनी और चूल्हे पर चढ़े अन्य गर्म पात्रों को संड्सी की पकड़ ही कुशलता से उतार पाती है। अगर चूल्हे पर दूध उफन रहा हो और आसपास संड्सी नदारद हो तो घर में ही दूध की गंगा बह जाती है।
समय के साथ किचेनवेयर में भी बदलाव आने लगा है। तवे का स्थान हैंडल वाले नॉन स्टिक pan पैन ने ले लिया है। सभी बर्तनों में आजकल हैंडल लगे होते हैं। फिर भी चिमटे और संड्सी का महत्व कम नहीं हुआ है। कुशल गृहिणी है जहां, चिमटा संड्सी है वहां।।
© श्री प्रदीप शर्मा
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