श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “पाप और पुण्य का खेल …“।)
अभी अभी # १०८३ ⇒ आलेख – पाप और पुण्य का खेल
श्री प्रदीप शर्मा
ये पाप है क्या, ये पुण्य है क्या !
रीतों पर धर्म की मोहरें है।
– साहिर
हम जो भी अच्छा-बुरा करते हैं, कुछ खुला, कुछ गुप्त करते हैं !नेकी दरिया में जाती है, बदी बदनामी दिलाती है। बैंक की बैलेंस शीट की तरह पुण्य और पाप जमा और नामे में दर्ज हो जाते हैं। देहमुक्त होते ही, चित्रगुप्त के दरबार में खाता खोला जाता है। पाप-पुण्य का हिसाब होता है, फैसला सुनाया जाता है। या तो स्वर्ग, या नर्क।
हानि-लाभ, जीवन-मरण, यश-अपयश, विधि हाथ !
– गोस्वामी तुलसीदास
लीजिए ! स्वर्ग-नरक का हिसाब चित्रगुप्त के हाथ और हानि-लाभ, यश-अपयश विधि हाथ। तब तो फिर अपना हाथ जगन्नाथ। लेकिन यह सब इतना आसान कहाँ ! तुम जैसे कर्म करोगे वैसा फल देंगे भगवान। अब आप या तो हानि-लाभ और यश-अपयश की चिंता कर लो, या पाप और पुण्य की।।
पुण्य का खेल तो बहुत आसान है ! पुण्य को दान-पुण्य भी कहते हैं। दान-पुण्य से स्वर्ग मिलता है। शास्त्रों में लिखा है। गंगा-नहा लेने से पापों से मुक्ति मिल जाती है। तीर्थाटन से पुण्य संचित होता है। कथा-भागवत सुनने से मोक्ष मिलता है और कुम्भ स्नान से न केवल पाप नष्ट होते हैं, अमृत की कुछ बूँदों की भी आप पर वर्षा हो जाती है। मतलब हम सबका न केवल स्वर्ग, अपितु मोक्ष और वैकुण्ठ भी सुरक्षित।
चलिए ! अगर आप से इतना भी नहीं होता तो फिकर नॉट। कलयुग नाम अधारा, सिमर सिमर उतरै पारा। जय श्रीराम।
रुकिए रुकिए कहाँ चले ! अपने पापों का भी तो हिसाब करते जाइए। अरे वाह साहब ! अभी तो आपने कहा था, कि गंगा स्नान से सब पाप नष्ट हो जाते हैं। उस ग्यारंटी का क्या हुआ ? हमें नहीं पता। लेकिन क्या आपको पता नहीं, झूठ बोलना, चोरी करना, किसी की निंदा करना, हिंसा करना, यह सब पाप है। काम, क्रोध, मद, मत्सर के रहते आप स्वर्ग नहीं जा सकते। आपका चित्त मलिन है, फिल्मी गाने गाया करता है। आप स्वर्ग नहीं घोर नर्क के भागी हो। क्या आपको ज्ञात नहीं, महाभारत के युद्ध के पश्चात, पाँच पांडवों में से केवल धर्मराज युधिष्ठिर ही स्वर्गारोहण कर पाए थे। एक के साथ एक फ्री की स्कीम में उनका वफादार कुत्ता भी स्वर्ग चला गया। उनके खाते में केवल आधा झूठ बरामद हुआ, जब उन्होंने कहा, नरो वा कुंजरो वा। वह भी धर्म की रक्षा के लिए। द्युत क्रीड़ा में शकुनि ने उनके साथ छल किया, इसलिए माफी मिल गई।।
तब आखिर एक सदाचारी की परिभाषा क्या ! क्या उसे दूध से धुला हुआ होना चाहिए ? जहाँ शुद्ध दूध और घी की ही गारण्टी नहीं, वहाँ केवल या तो अभिषेक-युक्त भगवान ही पंचामृत से धुले हुए हो सकते हैं, या फिर ऐश्वर्या-युक्त अभिषेक बच्चन। कितनी पीढ़ियों की पुण्याई है बंदे के पास।
हम लोग पूर्वजन्म में विश्वास नहीं रखते, स्वर्ग-नरक में विश्वास करते हैं, इसलिए या तो हमें स्वर्ग दे दो, वर्ना हमको दूसरा जन्म नहीं मंगता। eat, drink and be merry! नरक में जाएँ हमारे दुश्मन। बस, बात ख़तम।।
© श्री प्रदीप शर्मा
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