श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “भौंकने का अधिकार…“।)
अभी अभी # ११३१ ⇒ आलेख –
श्री प्रदीप शर्मा
तुमसे ही घर, घर कहलाया ! कहते रहें, कहने वाले, नारी नर्क की खान है। हम तो कहेंगे –
यत्र नार्यस्तु पुज्यन्ते,
रमन्ते तत्र देवताः।
आज जहाँ एक ओर पुरूष सत्ता-पक्ष और विपक्ष की राजनीति का मोहरा बना हुआ है, वहीं दूसरी ओर आज भी एक गृहिणी का दिन शुक्ल-पक्ष अथवा कृष्ण-पक्ष से शुरू होता है। वह सबसे पहले उठकर अखबार में तिथि नक्षत्र और शुभ मुहूर्त देखती है।
मुझे मेरी माँ की विरासत में पत्नी मिली है ! वैसे भी भारतीय पुरुषों की तुलना में भारतीय गृहिणियां अधिक धार्मिक होती हैं। उनके तीज-त्योहारों की एक बानगी देखिये ! गुड़ी पाड़वा, भाई दूज, अक्षय तृतीया, करवा-चौथ, ऋषि-पंचमी, बैंगन-छठ, सीतला-सप्तमी, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी, रामनवमी, गंगा-दशमी, डोल ग्यारस, बज बारस, धन-तेरस, रूप-चौदस(नर्क-चतुर्दशी), पूर्णिमा और सर्व-पितृ अमावस्या। व्रत-उपवास की तो पूछिए ही मत। रात में सबके खाने के बाद बच गया तो खा लिया, नहीं तो निर्जला व्रत।।
अति सर्वत्र वर्ज्यते ! वैसे भी पाँचों उंगलियाँ कहाँ बराबर होती है। जो पतिव्रता नारियाँ हैं, उनका आज करवा-चौथ का व्रत है। सुना है, आजकल पुरुष भी पत्नियों के लिए व्रत रखने लगे हैं। आपने शायद देखा भी हो। लेकिन छत पर चलनी की ओट में तो आसमान का चाँद देखा जाता है। पति तो सिर्फ पानी पिलाकर पत्नी का व्रत सम्पन्न कराता है। जो निष्ठा, समर्पण आज भी भारतीय महिलाओं का अपने पति के लिए है, पुरुष उस काबिल है कि नहीं, यह विचारणीय है। वह तो यह व्रत आपकी लंबी आयु के लिए ही रख रही है।
समय कितना भी बदल जाए, भारतीय महिला कितनी भी शिक्षित हो जाए, व्रत-तीज-त्योहार के संस्कार कहीं नहीं जाते। महिलाओं की संस्था हो या किटी पार्टी, सजना-संवरना और गीत-संगीत से उन्हें कोई दूर नहीं कर सकता। वेश-परिवेश का अंतर हो सकता है, आज भी महिलाओं की उत्सवप्रियता कश्मीर से कन्याकुमारी तक एक समान है।।
© श्री प्रदीप शर्मा
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