श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक ज्ञानवर्धक आलेख  अंतर्कथा :अभिनव गीत की… भाग – १ – आदि प्रसंग )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २८६ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

अंतर्कथा :अभिनव गीत की… भाग – १ – आदि प्रसंग☆ श्री राघवेंद्र तिवारी 

(आज से प्रस्तुत है श्री राघवेंद्र तिवारी जी का अभिनव गीत पर एक शोध परक आलेख अंतर्कथा :अभिनवगीत की..”। इस आलेख को हम तीन भागों (आदि प्रसंग, मध्य प्रसंग और उत्तर प्रसंग) में प्रस्तुत कर रहे हैं. यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि यह आलेख अभिनव गीत पर एक ऐतिहासिक दस्तावेज है.) 

☆ भाग – १ – आदि प्रसंग ☆

मैं उस कालखंड की बात कर रहा हूँ, जब हिंदी के कुछ उभरते और कुछ प्रतिष्ठित साहित्यकार प्रयोगधर्मिता के पीछे पड़े हुए थे। जो लिखा जा चुका है, उस से इतर लिखा जाये, नया- नया सा। फिर क्या था साहित्य की हर विधा के आगे जुड़ गया नया या नव जैसा विशेषण। नई कहानी, नई कविता, नए या ललित निबंध। नईकविता अर्थात अतुकांत(छान्दसिक नहीं)की भरमार। लिखने वाले छांदिक कविता(विशेषत:गीत) लिख रहे थे जिनकी भंगिमा बदली हुई थी। ऐसे गीतों को नवगीत की संज्ञा देते हुए ‘गीतांगिनी’ के सम्पादक राजेन्द्र प्रसाद सिंह ने पत्रिका के १९५८ के अंक में लिखा था :”नयी कविता के कृतित्व से युक्त या वियुक्त भी ऐसे धातव्य कवियों का अभाव नहीं है, जो मानव जीवन के ऊंचे और गहरे, किन्तु सहज नवीन अनुभव की अनेकता, रमणीयता, मार्मिकता, विच्छित्ति और मांगलिकता को अपने विकसित गीतों में सहेज -संवार कर नयी ‘टेकनीक’ से, हार्दिक परिवेश की नयी विशेषताओं का प्रकाशन कर रहे हैं। प्रगति और विकास की दृष्टि से उन रचनाओं का बहुत मूल्य है, जिनमें नयी कविता की प्रगति का पूरक बनकर ‘नवगीत’ का निकाय जन्म ले रहा है। नवगीत नयी अनुभूतियों की प्रक्रिया में संचयित मार्मिक समग्रता का आत्मीयता पूर्ण स्वीकार होगा, जिसमें अभिव्यक्ति के आधुनिक निकायों का उपयोग और नवीन प्रविधियों का संतुलन होगा”। राजेन्द्र प्रसाद सिंह ने एक तरह से इन गीतों का नामकरण कर दिया ‘नवगीत’। नया नाम मिलते ही नवगीत शृंखला प्रारम्भ हुई। निरंतर विस्तृत होती गई। उधर प्रबुद्ध रचनाकार नचिकेता ने कहा नई भंगिमा वाले गीतों को समकालीन- गीत कहा जाए। नवगीत और समकालीन गीत की ऊहापोह के बीच साठ के दशक में साप्ताहिक हिन्दुस्तान में महेश संतोषी का एक गीत छपा ( सुबह कहीं ऊगेगा\ शाम कहीं डूबेगा\सूरज वीरानों में \आधा इन प्रानों में \आधा उन प्रानों में)। साप्ताहिक ने इसे मात्र गीत के रूप में छापा। नवगीत की मान्यता नहीं दी। फिर भी नवगीतों का सृजन होता रहा। स्वयं गीतकारों ने समवेत संकलन प्रकाशित किए, नवगीत को परिभाषित करते हुए। एक ओर डॉ शंभूनाथ सिंह ने चुने हुए गीतकारों को लेकर नवगीत दशक की शृंखला में तीन समवेत संकलन प्रकाशित किए। दूसरी ओर शीर्ष नवगीतकवि निर्मल शुक्ल ने ‘शब्दपदी’ शृंखलाके अंतर्गत एक हजार से अधिक पृष्ठों का ग्रंथ (शब्दायन )प्रकाशित किया। इस में मेरे गीतों को भी स्थान मिला। उनकी अनियत- कालीन पत्रिका ‘उत्तरायण’ में भी अन्य प्रतिष्ठित नवगीतकारों के साथ मेरे नवगीत भी प्रकाशित होते रहे। इसी क्रम में ढाई सौ पृष्ठों का ग्रंथ ‘शब्दपदी :अनुभूति और अभिव्यक्ति’ नाम से प्रकाशित हुआ। ग्रंथ के अर्थबोध में शुक्लजी ने कहा ‘शब्दपदी एक शीर्षक है, और एक अभियान भी। गीत की स्थापना एवं उसकी प्रतिष्ठा हेतु समय -समय पर निरंतर प्रयास किए जा रहे हैं, जो निश्चित रूप से अपना प्रभाव छोड़ने में सफल रहे हैं’।

 सच कहूँ तो उन दिनों मैं नवगीतों का निष्ठवान पक्षधर था। इस बीच नवगीतों का मेरा पहला संकलन प्रकाश में आया। सुधी साहित्य सेवियों \पाठकों से व्यपक सराहना भी मिली। लेकिन, सच्चाई यह रही कि दो दशक बीतने पर भी न तो अकादमियों के प्रकाशनों में नवगीत को स्थान मिला, न धर्मयुग और साप्ताहिक हिंदुस्तान जैसी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में। नवगीत अगर छपे भी तो गीत के नाम से। अस्सी के दशक में सरस्वती जैसी प्रतिष्ठित पत्रिका में डॉ. राजेंद्र गौतम का वर्षा गीत(घन कुंतल मेघ घिरे) छपा। अप्रैल १९८१ में साप्ताहिक हिंदुस्तान ने अपने केंद्रीय पृष्ठ पर डॉ. देवेंद्र शर्मा इंद्र का नवगीत(हम पाटिलीपुत्र हुए)छपा। नवगीत शब्द का नामो निशान नहीं। तदन्तर सम्पादक मनोहर श्याम जोशी ने उन्हें चाय पर आमंत्रित किया। लम्बी चर्चा हुई नवगीत की गुणात्मकता और प्रामाणिकता पर। निश्चय हुआ कि दिल्ली के आस- पास के कवियों के नवगीत श्रृंखलाबद्ध रूप में छापे जाएंगे। बीस कवियों को स्थान मिला। नवगीत शब्द फिर भी गायब। गीत के नाम से जरूर प्रकाशित होते रहे नईम, उमाकांत मालवीय, रामदरश मिश्र, ओम प्रभाकर, शलभ श्री राम सिंह, छविनाथ मिश्र आदि के नवगीत। ।

मैं आज तक समझ नहीं पाया कि स्थापित और प्रतिष्ठित सरकारी – गैरसरकारी पत्रिकाओं में तो नवगीतों को मान्यता दी और क्यों न उन पर कोई चर्चा हुई। साहित्य अकादमी ‘समकालीन भारतीय साहित्य ‘नामक पत्रिका निकालती है। कविता, कहानी, आलेख न जाने क्या -क्या नहीं छपता, उस में। किन्तु नवगीत नहीं। इधर नवगीतकार मोह- मग्न हैं कि नवगीत आज कविता की केंद्रीय विधा है। मुझे तो लगता है केंद्रीय विधा न होकर, क्षयग्रस्त विधा है। कहने को मैंने छठे दशक के उत्तरार्ध में कादम्बिनी (सम्पादक: रामानंद दोषी )में प्रकाशित प्रेम शर्मा के गीत से असहमति व्यक्त की थी कि नवगीत विदाई की देहरी पर है। उनका नवगीत था (ना वे रथवान रहे\ना वे बूढ़े प्रहरी\कहती टूटी दीवट\सुन री ! उखड़ी देहरी)। यह नवगीत की जर्जर स्थिति को स्पष्ट करता है। आज मुझे लगता है कि प्रेम शर्मा के गीत में समय की सच्चाई थी। इस गीत का जिक्र किये बिना, डॉ.शम्भुनाथ सिंह ने नवगीत दशक एक, दो, तीन, प्रकाशित कर नवगीत को नया जीवन देने के प्रयत्न किये। नवगीतकारों के चयन की उनकी प्रक्रिया ऐसी थी कि अनेक श्रेष्ठ रचनाधर्मी ‘नवगीत दशक’ में इसलिए स्थान नहीं पा सके कि उनके आचरण से वे संतुष्ट नहीं थे। यहां रचना की गुणात्मकता से अधिक महत्वपूर्ण थी व्यक्ति की जीवन -शैली। अंत में निराशा ही हाथ लगी। नवगीत निराश ही करता रहा। इस के क्षरण से बचाने के लिये डॉ. सिंह ने ‘ नवगीत अर्धशती’ का प्रकाशन किया किन्तु नवगीत को नव- जीवन नहीं मिल सका। जिस तरह कोई फैशन कुछेक साल चल कर क्षीण हो जाती है, लगता है वही हाल नवगीतों का हुआ। फैशन की तरह ही कला, संस्कृति, साहित्य आदि भी अब अधिक चल नहीं पाते। वर्ष 1965 तक हिन्दी सिनेमा के गीतों में ‘मेलोडी’ चरम पर थी। यह समय नवगीतों के लिए भी उत्कर्ष का सिद्ध हुआ (देखें ‘कविता’64’)। इसके बाद सिनेमा से संगीत की वह स्वर माधुरी विलुप्त हो गई और नवगीत भी गड़बड़ाने लगा।

सोशल मीडिया में डॉ.राजेंद्र गौतम की टिप्पणी चर्चा में है : ‘गीतकारों और नवगीतकारों की सबसे बड़ी शिकायत यही रही है कि हिंदी के बड़े आलोचक गीत-नवगीत की उपेक्षा कर रहे हैं। लेकिन कुछ सवाल हमें खुद से भी पूछने होंगे। हम प्रासंगिक कितना लिख रहे हैं? कितना कैलेंडर को देख कर लिख रहें? हम कितने अतीत-जीवी हैं? वर्तमान घटनाओं से हमारा कितना सरोकार है? मौसम की निरापद बातें करना आसान है। समय के सवालों से टकराना मुश्किल। इस तरह की “रंजनकारी” रचनाएँ सत्ता को बहुत भाती हैं। नवगीत कोरा रूपवाद नहीं है। हमारी प्रासंगिकता हमारे कथ्य से तय होगी। कहीं हम पलायन की गुफा में जाकर तो नहीं सो गए हैं?यथास्थितिवाद कभी प्रासंगिक नहीं हो सकता’।

मुझे लगता है इस कथन में वजन है। नवगीत जिस ऊर्जा को लेकर चला था, लगता वह कहीं गुम हो गई। आवश्यकता है बदलाव की। नवगीतों में नयापन भरने की।

 – क्रमशः

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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