श्री अजीत सिंह

(हमारे आग्रह पर श्री अजीत सिंह जी (पूर्व समाचार निदेशक, दूरदर्शन) हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए विचारणीय आलेख, वार्ताएं, संस्मरण साझा करते रहते हैं।  इसके लिए हम उनके हृदय से आभारी हैं। आज प्रस्तुत है आपका एक संस्मरणीय आलेख आकाशवाणी के संग, जीवन के रंग।)

☆ आलेख – आकाशवाणी के संग, जीवन के रंग…  ☆ श्री अजीत सिंह ☆

आकाशवाणी से मेरा लगाव एक रोचक घटना से हुआ और फिर बढ़ते बढ़ते जीवन भर का प्रेम सम्बन्ध बन गया.

बात 1958-59 की है. मैं 13 साल का सातवीं क्लास का विद्यार्थी था. एक दिन हमारे अध्यापक हमें पास के गांव कोहन्ड ले गए जहाँ उस समय के रेल राज्य मंत्री शाहनवाज़ खान का जलसा था. शाहनवाज़ खान नेताजी सुभाष चंद्र बोस के साथी थे. वे आज़ाद हिन्द फ़ौज के अधिकारी रहे थे और लाल क़िले में उन पर अंग्रेज़ों ने देश द्रोह का मुक़दमा चलाया था जिसमे उनकी पैरवी जवाहरलाल नेहरू ने की थीं. ऐसा हमारे अध्यापक ने बता कर कार्यक्रम में विद्यार्थियों की रूचि बढ़ा दी थी.

जलसे का आयोजन आकाशवाणी दिल्ली के एक रेडियो अनाउंसर पंडित ह्रदय राम जी ने किया था. जलसे में पंडित जी ने अपने कोहन्ड गांव के लिए रेलवे स्टेशन की मांग की और लो जी मंत्री जी ने इसे मंज़ूर भी कर लिया. मुझे लगा कि रेडियो का अनाउंसर तो बहुत बड़ा अधिकारी होता है जो अपने गांव के लिए रेलवे स्टेशन तक मंज़ूर करा सकता है. मेरे बालमन में रेडियो अधिकारी बनने की इच्छा का अंकुर सा फूटने लगा जो आने वाले समय में सहज़ रूप से प्रफुल्लित होने वाला था.

रेडियो से मेरी मुलाक़ात वर्ष 1956 में हुई जब हमारे गांव में सरकार द्वारा एक कम्युनिटी रेडियो सेट प्रदान किया गया था.

उस समय गांव के लोग खेती बाड़ी के कार्यक्रम और लोकसंगीत व फ़िल्मी संगीत बड़े ही ध्यान से सुनते थे और नये बीजों के प्रति उनमें बड़ी जिज्ञासा थीं. गांव का सामुदायिक रेडियो सेट हमारी बैठक में ही रखा था और इसके साथ एक लाउड स्पीकर लगता था और लोग खुले चौक में जमीन पर बैठ ध्यान से प्रोग्राम सुनते थे. मुझे याद है उन दिनों नागिन और फागुन फिल्मों के गाने बड़े लोकप्रिय थे.

मैं जब कॉलेज में पहुंचा तो मेरी रूचि समाचारों और  करंट अफेयर्स के programme सामयिकी व स्पॉटलाइट में बन गई. इससे मेरा सामान्य ज्ञान बढ़ा और मैं बी एस सी के बाद यूपीएससी की परीक्षाएं देने लगा. ये मेरा सौभाग्य ही था कि मैं भारतीय सूचना सेवा में सेलेक्ट हो गया और मुझे पहली पोस्टिंग आकाशवाणी के शिमला केंद्र पर मिली. मेरे लिए यह बहुत ही उत्साहवर्धक अवसर था. 1971 में जब भारत पाक युद्ध हुआ तो हमारे न्यूज़ रीडर रामकुमार काले जी बीमार हो गए और मुझे ख़बरें पढ़ने का मौका मिला. शिमला समझौते के लिए प्रधान मंत्री इंदिरा गाँधी और पाकिस्तान के राष्ट्रपति ज़ुल्फी कार भुट्टो अपनी बेटी बेनज़ीर भुट्टो के साथ आए थे. इसकी कवरेज भी एक अनूठा अनुभव था. मैंने देखा कि रेडियो पत्रकार होने के नाते मैं ऐतिहासिक घटनाओं का प्रत्यक्ष दर्शी गवाह बन रहा था. यह सिलसिला बहुत दूर जाने वाला था.

जम्मू कश्मीर में मैंने रेडियो करेस्पोंडेंट के तौर पर करीबन 20 साल काम किया. इसमें अमन और तरक्की का दौर भी था और फिर आतंकवाद का कठिन दौर भी.

इस दौरान करीबन सभी अख़बारों और मीडिया पर आतंक का साया मंडरा रहा था. आम आदमी न तो प्रेस में कोई बयान दे सकता था न वो कैमरे के सामने बोल सकता था. श्रीनगर में मेरे साथी बशीर मलिक ने सदा ए जरस नाम से एक साप्ताहिक रेडियो प्रोग्राम शुरू किया जिसमें मेरा भी कुछ सहयोग रहता था. प्रोग्राम में आम आदमी चिट्ठियां लिखकर आतंकवादियों के ज़ुल्मों की दास्तांनें बयान करते थे. वे फ़ोन पर भी अपने दर्द की कहानियां रिकॉर्ड कराते थे. यह कार्यक्रम बड़ा ही लोकप्रिय हुआ था. आख़िरकार ये रेडियो ही था जिसने आम आदमी की आवाज़ को उठाया था उसकी निजी सुरक्षा को खतरा पहुंचाए बिना.

हज़रतबल दरगाह  और चरार ए शरीफ दरगाह पर आतंकी हमले की कवरेज भी मैंने की थीं.

2002 के विधान सभा चुनाव और फिर कारगिल युद्ध को भी मैंने रिपोर्ट किया था. मुझे जम्मू कश्मीर में कवरेज के लिए आकाशवाणी के बेस्ट करेस्पोंडेंट का पुरस्कार भी मिला था.

यह रेडियो ही था जिसने मुझे तत्कालीन प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की अमरीका, जर्मनी और स्विट्ज़रलैंड की यात्राओं की कवरेज का मौका दिया. यह अवसर अमरीका में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर 11 सितम्बर 2001 के आतंकी हमले की पहली वर्षगांठ का था.

रेडियो ने मेरे व्यक्तित्व को निखारा है.  सही उच्चारण के साथ धारा प्रवाह बोलना सिखाया है. आवाज़ का उतार चढाव सिखाया है. टेलीविज़न और समाचार पत्र हमारी टोटल अटेंशन मांगते हैँ. रेडियो आप कुछ भी काम करते हुए सुन सकते हैँ.

रेडियो ने लोक संगीत और कला को बढ़ावा दिया है. किसान उन्नत बीजों को रेडियो बीजों के नाम से पुकारते हैँ. यह मनोरंजन का उत्तम माध्यम है. हमारे अकेलेपन का साथी है.

आकाशवाणी के अनाउंसर पंडित हृदय राम की तरह मैं अपने गांव के लिए रेलवे स्टेशन तो नहीं बनवा सका पर हमारे कुछ  प्रयत्नों से पैतृक गांव हरसिंघपुरा में एक केंद्रीय विद्यालय अवश्य खुल गया. पुत्र संजय सिंह और मैं करनाल क्षेत्र के सांसद व केंद्रीय गृह राज्य मंत्री आई डी स्वामी से मिले तो उन्होंने कहा की करनाल ज़िले के लिए सरकार ने एक केंद्रीय विद्यालय मंज़ूर किया है पर कोई पंचायत उसके लिए ज़मीन देने को तैयार नहीं है. केंद्रीय विद्यालय की मांग का प्रस्ताव हमने अपनी ग्राम पंचायत से पास करा कर मंत्री जी को सौंप दिया. और लौ हमारे गांव में केंद्रीय विद्यालय खुल गया जहाँ आज एक हज़ार से ऊपर विद्यार्थी शिक्षा पा रहे हैँ.

धन्यवाद आकाशवाणी. यह भी खूब रही.

दस वर्ष की आयु में शुरू हुआ आकाशवाणी प्रेम आज 80 साल की उम्र में भी जारी है. मैं सुबह 8 बजे के समाचार मोबाइल पर निश्चित रूप से सुनता हूँ. दिन भर विविध भारती से जुड़ाव रहता है. अन्य काम साथ चलते रहते हैँ.

अपने मोबाइल में आकाशवाणी का कोई app डाउनलोड कर लीजिए. जो स्टेशन चाहें सुनिए.

मेरी तरह. हाँ मैं जम्मू के डोगरी लोकगीत सुनता रहता रहता हूँ. रोहतक और हिसार केंद्रों से हरयाणवी लोकगीत सुनता हूँ.

रेडियो ठंडी हवा का झोंका जैसे है. तरो ताज़ा कर देता है.

Radio आवाज़ के जादू का medium है. मोबाइल फ़ोन में भी अब यह आपके साथ रहता है. जब तक इंसान की आवाज़ है, रेडियो ज़िंदा रहेगा.

देश विदेश से समाचार भेजते हुए मैं कहता था, फलां शहर से मैं अजीत सिंह आकाशवाणी समाचार के लिए.

आज मैं कहना चाहता हूँ :

आकाशवाणी के प्रेम की 70 वर्षीय यादों के झुरमुट के साथ हरियाणा के हिसार  से मैं 80 वर्षीय अजीत सिंह.

आकाशवाणी के इतिहास के 90 साल वाकई

बाकमाल, बाकमाल.

☆ ☆ ☆ 

 © श्री अजीत सिंह

पूर्व समाचार निदेशक, दूरदर्शन हिसार।

मो : 9466647037

(लेखक श्री अजीत सिंह हिसार से स्वतंत्र पत्रकार हैं । वे 2006 में दूरदर्शन केंद्र हिसार के समाचार निदेशक के पद से सेवानिवृत्त हुए।)

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares
0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

0 Comments
Oldest
Newest Most Voted