डाॅ राकेश सक्सेना
(डाॅ राकेश सक्सेना जी पूर्व सदस्य हिंदी सलाहकार समिति, खान मंत्रालय, भारत सरकार, जेएलएन पी०जी० काॅलेज, एटा से हिंदी विभागाध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त हैं। कनाडा, भूटान, नेपाल, श्रीलंका, ताशकंद आदि देशों की विदेश यात्राएँ। 07 मौलिक कृतियां, 20 सम्पादित, अनगिनत पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित. आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख – पावस ऋतु के विषैले जीव: पहचान, संरक्षण और सुरक्षा।)
☆ आलेख – पावस ऋतु के विषैले जीव: पहचान, संरक्षण और सुरक्षा ☆ डाॅ राकेश सक्सेना
भारतीय ऋतुचक्र में पावस केवल हरियाली, कृषि समृद्धि तथा वर्षा का ही नहीं, यह जैव विविधता की दृष्टि से भी अत्यन्त सक्रिय और रचनात्मक काल होता है। महीनों से सूखी मिट्टी में सोए हुए बीज अंकुरित हो जाते हैं, हिरण-लोमड़ी इसी मौसम में पैदा होते हैं, मेंढ़क-टोड प्रजनन शुरू कर देते हैं, तितलियाँ, मधुमक्खी, दीमक, जुगनू की संख्या कई गुना बढ़ जाती है, नदियाँ- तालाब पानी से भर जाते हैं और इसी समय अनेक विषैले जीव — साँप, बिच्छू, मकड़ियाँ और कनखजूरे अपने आवासों से निकलकर बस्तियों में दिखाई देने लगते हैं। परिणामस्वरूप सर्प एवं बिच्छूदंश जैसी अनेक घटनाएँ घटित होने लगती हैं। इस ऋतु में तापमान, आर्द्रता और नमी बढ़ जाती है। वर्षा के कारण बिलों में पानी भर जाता है, प्रजनन काल आरम्भ होने व भोजन की उपलब्धता बढ़ने से ये विषैले जीव मानव-आवासों की ओर बढ़ जाते हैं।
भारत में तीन सौ से अधिक साँपों की प्रजातियाँ पाईं जाती हैं, जिनमें लगभग साठ प्रजातियाँ अधिक विषैली होती हैं। भारतीय कोबरा, सामान्य करैत, रसेल वाइपर, साॅस्केल्ड वाइपर सर्वाधिक घातक सर्प होते हैं। अधिकांश सर्पदंश की घटनाएँ इन्हीं से सम्बन्धित होती हैं। बिच्छू की भी यहाँ सौ से अधिक प्रजातियाँ पाईं जाती हैं। लाल और काले बिच्छुओं का डंक अत्यधिक घातक व पीड़ादायक होता है। यहाँ की अधिकांश मकड़ियाँ विषैली किन्तु हानिरहित होती हैं। कुछ प्रजातियों का विष त्वचा व स्नायुतंत्र को प्रभावित करता है। कनखजूरा का विष भी प्राणघातक तो नहीं होता किन्तु पीड़ा, सूजन तथा एलर्जी उत्पन्न करता है। ततैया, बर्र, मधुमक्खियाँ तथा इल्ली भी विषैला प्रभाव उत्पन्न करती हैं। सभी विषैले साँपों का विष एक जैसा नहीं होता। कुछ का विष मस्तिष्क और स्नायुतंत्र को प्रभावित करता है जिसमें पलकें झुक जाती हैं, बोलने में कठिनाई, साँस लेने में परेशानी व माँसपेशियाँ शिथिल हो जाती हैं। नाग और करैत का विष इसी प्रकार होता है। कुछ का रक्त पर प्रभाव पड़ता है, रक्त के थक्के बनने की क्षमता को प्रभावित करता है। मसूड़ों से रक्तस्राव, मूत्र में रक्त, गुर्दों पर दुष्प्रभाव आदि इनके लक्षण होते हैं। रसेल वाइपर इसका प्रसिद्ध उदाहरण है। कुछ सर्पों का विष ऊतकों को क्षति पहुँचाता है। यह विष काटे गए स्थान की कोशिकाओं को नष्ट करता है। तीव्र सूजन, फफोले, संक्रमण,ऊतकों का नष्ट होना इसके प्रमुख लक्षण होते हैं।
ये विषैले जीव जहाँ एक ओर हानिकारक हैं वहाँ दूसरी ओर पारिस्थितिकी में उपयोगी घटक भी हैं। साँप एक वर्ष में सैकड़ों चूहों को खा जाते हैं। यदि ये नहीं होंगे तो कृषि को नुकसान होगा, अनाज भंडारण कठिन होगा, चूहों से फैलने वाले रोगों में वृद्धि होगी। सर्प स्वयं खाद्य श्रृंखला का हिस्सा है। ये स्वयं गरुड, मोर, नेवला, उल्लू जैसे जीवों के भोजन बनते हैं। इनके विष से अनेक औषधियों के विकास पर अनुसंधान हो रहा है। भारत में अधिकांश साँप वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 के अंतर्गत संरक्षित हैं। इनका शिकार, अवैध व्यापार, अनावश्यक हत्या दण्डनीय अपराध माना गया है। यदि किसी घर या परिसर में ये दिखाई दें तो मारने के बजाय प्रशिक्षित वन विभाग अथवा अधिकृत सर्परक्षक को सूचना देना उचित बताया गया है।
पावस ऋतु में इन विषैले जीवों से स्वयं को बचाना अति आवश्यक है। दुर्घटनाओं से बचाव हेतु रात को टाॅर्च का उपयोग करें, ऊँचे जूते पहनकर खेतों में जाएँ, हाथ डालने से पूर्व लकड़ी,घास या पत्थरों को डण्डे से हटाएँ, झाड़ियाँ- कचरा आसपास न रखें, दरवाजों और खिड़कियों की दरारें बंद रखें। सर्पदंश से होने वाली अनेक मौतें समय पर उपचार न मिलने के कारण होती हैं। गाँवों में आज भी कई लोग झाड़- फूँक, ताबीज, मंत्र व घरेलू नुस्खों पर भरोसा करते हैं, जिससे बहुमूल्य समय नष्ट हो जाता है। घाव को चाकू से काटना, विष चूसने का प्रयास करना, बर्फ लगाना, बहुत कसकर पट्टी बाँधना, झाड़- फूँक, रोगी को शराब पिलाना इन उपायों से लाभ नहीं होता, स्थिति गंभीर हो जाती है। समय पर अस्पताल पहुँचने से रोगियों का सफल उपचार सम्भव है। अत: सर्पदंश केवल वन्यजीवों से जुड़ी समस्या ही नहीं, जनस्वास्थ्य, ग्रामीण चिकित्सा व्यवस्था, समय पर उपचार और जनजागरूकता से भी जुड़ा विषय है। जब समाज ज्ञान और जागरूकता को अपनाएगा तभी पावस ऋतु की हरियाली के साथ मानव और वन्यजीवों का संतुलित सहअस्तित्व सुरक्षित रह सकेगा।
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© डाॅ राकेश सक्सेना
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