डाॅ राकेश सक्सेना

(डाॅ राकेश सक्सेना जी पूर्व सदस्य हिंदी सलाहकार समिति, खान मंत्रालय, भारत सरकार, जेएलएन पी०जी० काॅलेज, एटा से हिंदी विभागाध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त हैं। कनाडा, भूटान, नेपाल, श्रीलंका, ताशकंद आदि देशों की विदेश यात्राएँ। 07 मौलिक कृतियां, 20 सम्पादित, अनगिनत पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित.  आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख  – पापा का गुस्सा: अनुशासन, प्रेम और जिम्मेदारी का द्वंद्व।)

☆ आलेख – पापा का गुस्सा: अनुशासन, प्रेम और जिम्मेदारी का द्वंद्व ☆ डाॅ राकेश सक्सेना ✍

भारतीय परिवार में पिता की भूमिका आर्थिक भरण-पोषण तक सीमित नहीं है। वह परिवार का संरक्षक, मार्गदर्शक,अनुशासक और भावनात्मक स्तम्भ होता है। यदि माँ वात्सल्य की मूर्ति है तो पिता को दृढ़ता और संकल्प का आधार माना जाता है। पारिवारिक व्यवस्था में वह अनुशासन, उत्तरदायित्व और संरक्षण का प्रतीक है। धर्म, मर्यादा, संस्कार और पीढ़ियों को जोड़ने वाली कड़ी है किन्तु इसी भूमिका का एक ऐसा भी पक्ष है जो प्राय: बच्चों को कठोर, भयावह और अन्यायपूर्ण प्रतीत होता है, वह है— पिता का गुस्सा। यह गुस्सा केवल क्रोध की सहज अभिव्यक्ति नहीं है अपितु यह अनुशासन स्थापित करने का प्रयास, भविष्य की चिंता का परिणाम तो कभी आर्थिक, सामाजिक व मानसिक दबावों की प्रतिक्रिया होती है। उसके गुस्से को नकारात्मक व्यवहार मान लेना उचित नहीं है। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से प्रत्येक कठोर स्वर हिंसा नहीं होता किन्तु प्रत्येक अनियंत्रित क्रोध निश्चित रूप से सम्बन्धों को आहत करता है।

    पिता का क्रोध अनेक परिस्थितियों का परिणाम होता है। वह अपने बच्चों का सुरक्षित भविष्य चाहता है। पढ़ाई में लापरवाही, अनुशासनहीनता या गलत संगति उसे चिंतित करती है,जो कभी-कभी गुस्से में प्रकट होती है। पारिवारिक जिम्मेदारियाँ, रोजगार की अस्थिरता, महँगाई और सामाजिक अपेक्षाएँ, उसके अंदर मानसिक तनाव उत्पन्न करतीं हैं। कई पिता अपनी भावनाएँ सहजता से व्यक्त नहीं कर पाते, जिसके कारण प्रेम के स्थान पर कठोरता दिखाई देती है। आज के बच्चे स्वतंत्रता चाहते हैं जबकि कई पिता परम्परागत अनुशासन में विश्वास रखते हैं। ये अंतर भी संघर्ष को जन्म देते हैं लेकिन अक्सर कहा जाता है कि पिता इसलिए डाँटते हैं क्योंकि उन्हें बच्चों की चिंता होती है, पिता का गुस्सा प्रेम का दूसरा रूप है।विचारणीय तथ्य यह भी है कि प्रेम की अभिव्यक्ति यदि क्रोध के माध्यम से होगी तो बच्चे उसके पीछे छिपे स्नेह को नहीं समझ पाएँगें। एतदर्थ प्रेम और अनुशासन के बीच संतुलन आवश्यक है। अनुशासन, प्रेरणा, संवाद निरंतर मार्गदर्शन से भी स्थापित किया जा सकता है। अनुशासन और भय में इतना ही अंतर है कि  अनुशासन आत्मविश्वास बढ़ाता है, भय आत्मविश्वास को घटाता है। अनुशासन व्यक्तित्व विकसित करता है तो भय व्यक्तित्व को दबा देता है। बच्चे केवल शब्द नहीं बल्कि भावनाएँ भी सीखते हैं। यदि घर में संवाद, सम्मान और संयम होगा तो बच्चे इन्हीं मूल्यों को अपनाएँगे इसके विपरीत यदि घर में चिल्लाना, अपमानित करना या भय का वातावरण होगा तो बच्चे झूठ बोल सकते हैं, आक्रामक व संकोची बन सकते हैं, आत्मविश्वास खो सकते हैं और पिता से भावनात्मक दूरी बना सकते हैं।

     आज का पिता पहले की अपेक्षा जटिल परिस्थितियों में जीवन को जी रहा है। बढ़ती आर्थिक प्रतिस्पर्धा, नौकरी का असुरक्षित वातावरण, डिजिटल व्यसन,सोशल मीडिया का प्रभाव, शिक्षा का बढ़ता दबाव, परिवार के लिए समय का अभाव आदि परिस्थितियों में पिता का तनाव बढ़ना स्वाभाविक है। यदि तनाव का उचित प्रबंधन न हो तो वह घर में क्रोध के रूप में प्रकट हो सकता है। आधुनिक पारिवारिक मनोविज्ञान यह स्वीकार करता है कि एक सफल पिता वह नहीं जिससे बच्चे भयभीत रहें अपितु वह है जिस पर बच्चे विश्वास करें। सकारात्मक पितृत्व के लिए क्रोध से पहले संवाद, आदेश से पहले कारण, आलोचना से पहले प्रोत्साहन, दण्ड से पहले मार्गदर्शन, नियंत्रण से पहले विश्वास आदि प्रमुख आधार बन सकते हैं। गुस्से पर नियंत्रण रखने के लिए भी पिता को प्रतिक्रिया देने से पहले कुछ क्षण रुकना चाहिए, समस्या पर बात करें, बच्चे की आयु और मानसिक अवस्था को समझें, संवाद के लिए समय सुनिश्चित करें! साथ ही बच्चों को भी चाहिए कि वे पिता के संघर्षों को समझें, झूठ से बचें, सम्मानपूर्वक अपनी बात रखें, पिता की बातों की कद्र करें, अनुभव हमेशा उम्र से बड़ा होता है।

       सारत: कहा जा सकता है कि पिता का गुस्सा : अनुशासन, प्रेम और जिम्मेदारी का द्वंद्व है। यह केवल भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं अपितु जिम्मेदारियों, सामाजिक अपेक्षाओं, आर्थिक दबावों और संतान के भविष्य की चिंता का मिश्रित परिणाम होता है फिर भी यह स्वीकार करना होगा कि प्रेम की अभिव्यक्ति यदि केवल कठोरता के माध्यम से होगी तो उसका उद्देश्य अधूरा रह जाएगा। आधुनिक समय की आवश्यकता है कि पिता अनुशासन और स्नेह के बीच ऐसा संतुलन स्थापित करे जिससे बच्चे भय नही, विश्वास के साथ निकट आ सकें। पितृत्व ऐसा हो जिसमें अनुशासन तो हो पर अपमान न हो, दृढ़ता हो पर क्रूरता न हो, अपेक्षाएँ हों तो संवाद भी हो और सबसे बढ़कर प्रेम हो, जो शब्दों, व्यवहार व अपनत्व में दिखाई दे।

©  डाॅ राकेश सक्सेना

पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष, 68, शान्तीनगर, एटा ( उ०प्र० ) 207001

मोबाइल: 94122 82235

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares
0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

0 Comments
Oldest
Newest Most Voted