डाॅ राकेश सक्सेना

(डाॅ राकेश सक्सेना जी पूर्व सदस्य हिंदी सलाहकार समिति, खान मंत्रालय, भारत सरकार, जेएलएन पी०जी० काॅलेज, एटा से हिंदी विभागाध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त हैं। कनाडा, भूटान, नेपाल, श्रीलंका, ताशकंद आदि देशों की विदेश यात्राएँ। 07 मौलिक कृतियां, 20 सम्पादित, अनगिनत पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित.  आज प्रस्तुत है आपका एक शोधपरक आलेख  – चापेकर बंधु: भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन के प्रथम संगठित शहीद।)

☆ आलेख – चापेकर बंधु: भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन के प्रथम संगठित शहीद ☆ डाॅ राकेश सक्सेना ✍

चापेकर बंधु महाराष्ट्र पुणे के निकट चिंचवड़ ग्राम के तीन सगे भाई थे जिन्होंने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में सशस्त्र क्रांति की पहली चिंगारी जलाई थी। दामोदर हरि चापेकर, बालकृष्ण हरि चापेकर, वासुदेव हरि चापेकर  तीनों ब्राह्मण परिवार में जन्मे सगे भाई थे। इनके पिता हरिपंत चापेकर प्रसिद्ध कीर्तनकार तथा माता का नाम लक्ष्मीबाई था। तीनों भाई बचपन में पिता के साथ कीर्तन में सहभाग किया करते थे। महर्षि पटवर्धन और लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक इनके आदर्श थे। तिलक की प्रेरणा से इन भाइयों ने युवकों का ‘ व्यायाम मण्डल ‘ बनाया जिसमें 1894 ई० से हर वर्ष शिवाजी और गणेश महोत्सव प्रारम्भ किया। 12 जून 1897ई० में जब पहली बार शिवाजी उत्सव मनाया गया तो इन भाइयों ने बड़े ही उत्साह के साथ इसमें सहभाग किया। इन्होंने इस उत्सव में जो श्लोक गाए, उसका अर्थ था कि शिवाजी की गाथा दुहराने से आज़ादी नहीं मिल सकती। हमें तो शिवाजी और बाजीराव की भाँति कमर कसकर संघर्ष करना होगा, आज़ादी हित तलवार उठानी होगी। हम मारकर ही मरेंगे और आप लोग घर बैठे औरतों की तरह हमारी कहानी को सुनोगे। इसी प्रकार गणेश उत्सव पर इन भाइयों ने गाया, जिसका भाव था कि मर जाओ किन्तु पहले अँग्रेजों को मारो! चुप मत बैठो! पृथ्वी पर बोझ मत बढ़ाओ! हमारे देश का नाम हिन्दुस्तान है, फिर यहाँ अँग्रेज क्यों राज्य करते हैं? ये थी चापेकर बंधुओं की अँग्रेजों के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष की ललकार।

दामोदर बचपन से ही सैनिक बनना चाहते थे इसलिए वे व्यायाम और सैन्य प्रशिक्षण में रुचि लेते थे। उन्नीसवीं शताब्दी के अंत तक पुणे भारतीय राष्ट्रवाद का प्रमुख केन्द्र बन चुका था। अँग्रेजी शासन भारतीय जनता का आर्थिक दोहन कर रहा था, कुटीर उद्योग नष्ट होने लगे और बेरोजगारी बढ़ रही थी, भारतीयों के साथ नस्लीय भेदभाव सामान्य बात थी। ब्रिटिश राज्य के खिलाफ दामोदर ने मुंबई में रानी विक्टोरिया के पुतले पर तारकोल पोतकर जूतों की माला पहनाई थी। वर्ष 1886 ई० के अंत में पुणे में ब्युबोनिक प्लेग फैला, जिसकी रोकथाम के लिए ब्रिटिश सरकार ने आईसीएस अधिकारी वाॅल्टर चार्ल्स रैंड को नियुक्त किया। प्लेग नियंत्रण के नाम पर अँग्रेज अधिकारियों का बिना अनुमति के घरों में प्रवेश करना, महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार करना, धार्मिक स्थलों का अपमान करना तथा लोगों की निजी सम्पत्ति को नष्ट करना आरम्भ कर दिया। तिलक ने ‘ केसरी ‘ समाचार पत्र में इसकी कड़ी आलोचना की, जिसके कारण उन्हें जेल हुई। चापेकर बंधुओं ने प्लेग के दौरान जनता की पीड़ा को निकट से देखा था। वे स्वयं प्रभावित परिवारों के सम्पर्क में आए और ब्रिटिश सैनिकों के दुर्व्यवहार के अनेक उदाहरणों के साक्षी बने थे इसलिए तीनों भाइयों ने विचार किया कि यदि ऐसे अत्याचारों का प्रतिरोध नहीं किया गया तो अँग्रेजी शासन और अधिक निरंकुश हो जाएगा, इसलिए इन्होंने अत्याचार के प्रतीक माने जाने वाले रैंड को दण्डित करने का निर्णय लिया। इन बंधुओं ने कई दिनों तक रैंड की गतिविधियों का अध्ययन किया तदन्तर 22 जून 1897 ई० को महारानी विक्टोरिया की 60वीं वर्षगाँठ के समारोह से लौटते समय दामोदर हरि चापेकर ने रैंड को और बालकृष्ण ने उसके सहायक लेफ्टिनेंट आयर्स्ट को गोली मार दी। यह भारत की आज़ादी की लड़ाई में पहला क्रांतिकारी धमाका था।

रैंड बध कांड ने ब्रिटिश प्रशासन की नींव हिला दी थी। आसपास के क्षेत्रों में तलाशी अभियान शुरू हुआ। इनाम के लालच में गणेश शंकर द्रविड़ और रामचंद्र द्रविड ने चापेकर बंधुओं के सम्बन्ध में जानकारी दी और ब्रिटिश पुलिस ने दामोदर हरि चापेकर को गिरफ्तार कर लिया अंतत: 18 अप्रैल 1899ई० को उनको फाँसी दे दी गई। बालकृष्ण हरि चापेकर और वासुदेव हरि चापेकर ने इस विश्वासघात को राष्ट्रद्रोह मानते हुए मुखबिर द्रविड बंधुओं को दण्डित करने का निर्णय लिया। सन् 1899ई०में दोनों मुखबिरों की हत्या कर दी गई। इसके बाद ब्रिटिश हुकूमत ने और अधिक कठोर कार्यवाही करते हुए बालकृष्ण और वासुदेव दोनों को गिरफ्तार कर लिया अंतत: वासुदेव को 08 मई 1899 तथा बालकृष्ण को 12 मई 1899 ई०को फाँसी दे दी गई। इस प्रकार तीनों भाइयों ने राष्ट्र की स्वतंत्रता और स्वाभिमान के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए।

सारत: हम कह सकते हैं कि चापेकर बंधुओं का बलिदान भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का अत्यन्त प्रेरक अध्याय है। इनकी शहादत ने युवाओं में आत्मविश्वास, संगठन और प्रतिरोध की भावना को नई दिशा दी, इसी कारण उन्हें भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन के प्रथम संगठित शहीदों में अग्रणी स्थान प्राप्त है। महाराष्ट्र, बंगाल, पंजाब और उत्तर भारत के अनेक क्रांतिकारी संगठनों ने इन भाइयों के साहस से प्रेरणा प्राप्त की। विनायक दामोदर सावरकर के वैचारिक निर्माण पर चापेकर बंधुओं के बलिदान का गहरा प्रभाव माना जाता है। खुदीराम बोस, रामप्रसाद बिस्मिल, अशफ़ाक उल्ला खाँ, चन्द्रशेखर आजाद, भगतसिंह आदि की भी कार्यशैली और वैचारिक पृष्ठभूमि भिन्न थी किन्तु इनके बलिदान की भावना में चापेकर बंधुओं की परम्परा स्पष्ट दिखाई देती है। इन बंधुओं का साहस, संगठन और राष्ट्रनिष्ठा हमारी अमूल्य धरोहर है इसलिए भारतीय इतिहास में इनका नाम सदैव आदर,श्रद्धा व गौरव के साथ स्मरण किया जाएगा।

©  डाॅ राकेश सक्सेना

पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष, 68, शान्तीनगर, एटा ( उ०प्र० ) 207001

मोबाइल: 94122 82235

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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