श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’
(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा – गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी, संस्मरण, आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – पवित्र रिश्ता।)
☆ लघुकथा # १०७ – पवित्र रिश्ता ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆
बेटा आज शाम को तुम्हें देखने लड़के वाले आ रहे हैं थोड़ा बेसन का उबटन लगा लो रागिनी ने अपनी बेटी सुमन से कहा।
सुमन चिल्ला कर बोली – “क्यों पकौड़े बनाकर मुझे ही उन्हें खिलाने वाली हो क्या?”
सुमन ने कहा- “माँ मैं जैसी हूं वैसे ही उनके सामने आऊॅंगी बनावट का श्रृंगार मुझे नहीं करना है।”
“ठीक है अच्छा अच्छा आराम कर ले” सुमन ने गहरी सांस भरते हुए कहा।
वह रसोई में चली गई नाश्ता बनाने के लिए।
उनके मन में बड़ी उलझन थी कि क्या आज इसका रिश्ता तय होगा या नहीं पता नहीं लड़का कैसा मिलेगा?
शाम को जब लड़के वाले घर पहुंचे तब सुमन एक हल्के गुलाबी रंग का सलवार कुर्ता पहनकर हल्के मेकअप के साथ उनके सामने उपस्थित हुई।
लड़के की माँ ने पूछा- ‘बेटा तुम्हें खाना बनाना आता है? ‘
“आंटी हाँ मैं थोड़ा बहुत बना लेती हूँ चाय नाश्ता अच्छे से बना लेती हूँ” सुमन ने कहा।
सुमन की माँ ने कहा- “बहन जी आजकल लड़कियाँ खाना कहाँ बनाती हैं नौकरी और काम से फुर्सत कहाँ मिलती है।”
रागिनी ने कहा – “बहन जी मेरी इकलौती बेटी है इसके पिताजी बिजनेस के सिलसिले में बाहर गए हैं हमारी खिलौने की बड़ी दुकान है।”
रागिनी ने पूछा- “बहन जी आपका बेटा क्या करता है?”
लड़के की माँ ने कहा – “मेरे पति का 2 साल पहले स्वर्गवास हो गया है पर पुलिस में बड़े अधिकारी थे उनकी जगह मेरे बेटे को नौकरी मिल गई है।“
रागिनी ने कहा- “बेटा अजय तुम हम लोगों से बात नहीं करोगे क्या?”
“नहीं आंटी एक बात मैं आपको बता दूँ, मुझे भी काम के सिलसिले में दिनभर किसी भी समय इधर-उधर जाना पड़ता है।”
‘हाँ बेटा मैं समझ सकती हूँ” रागिनी ने कहा।
“आंटी सुमन शादी के बाद क्या नौकरी छोड़ देगी?”
तभी सुमन बोल पड़ी “मैं कोई रामायण की सीता नहीं हूँ यह बात आप अच्छे से समझ लीजिए?”
“मैं आधुनिक नारी हूँ, यदि आप राम बनके रहेंगे तो मैं सीता रहूंगी नहीं तो मैं काली बनना जानती हूँ, आगे आप स्वयं समझदार है” इतना कहकर अंदर चली जाती है।
रागिनी और लड़के की माँ एक दूसरे को देखती रहती हैं। इंस्पेक्टर अजय ने कहा – “रामराज्य नहीं है आज के जमाने में कहीं लेकिन आंटी मैं भी रावण तो नहीं हूँ।”
“आपकी बेटी का जब गुस्सा शांत हो जाएगा तब मैं उससे मिलने आऊॅगा। शादी एक पवित्र रिश्ता है जब हमारे मन मिलेंगे तभी शादी होगी” इतना कहकर माँ बेटे दोनों चले जाते हैं।
© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’
जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈



