मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग
कविता – चुभती स्मृतियों का रोमांच…
मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग ☆
किताब में “उसकी” तस्वीर
यक़ीनन कोई बुक मार्कर नहीं थी
महफूज़ थी गर्द ओ ग़ुबार से
यादों में पैवस्ता एक दस्तावेज की तरह
उसे देखने की लालसा में
वह किताब जिसमें तस्वीर रखी थी
कभी बुक शेल्फ के पुस्तक संग्रह में
नहीं सजती थी
अक्सर रीडिंग टेबल पर या
बिछौने के सिरहाने रखी रहती थी
जानबूझकर, न चाहते हुए भी
मैं उस किताब को पढ़ने का उपक्रम करता था
और अतीत के घावों को खुद कुरेद कर
हरे और ताज़े कर लेता था
कई बार मन में आया कि,फाड़कर फेंक दूं
लेकिन सचमुच लगा कि
यह आसां तो नहीं था और सहेजा था ऐसा कुछ
तो यह उतना व्यर्थ का प्रयोजन नहीं था
सुना था कि…
चुभती चीज़ें भी, जिस्म ओ जां को राहत देकर
ज़िंदगी में बहुत से मर्ज़ ठीक करने की विधा हैं
सो वह यादगार आज भी वैसी ही रखी है…!!!!!
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© मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग
संपर्क – बिलासपुर (छ ग) मो नं 8319743682
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





