श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना धरा की मुस्कान, जीवन का सम्मान। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # २९७ ☆

धरा की मुस्कान, जीवन का सम्मान ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

धानी चूनर ओढ़े धरती,

मंद-मंद मुस्काती।

हरित धरा की अनुपम छवि पर,

मेघ सुधा बरसाती।।

भारतीय संस्कृति में प्रत्येक पर्व केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि जीवन-मूल्यों का संदेश भी देता है। हरियाली अमावस्या ऐसा ही एक पर्व है, जो हमें प्रकृति के प्रति प्रेम, संवेदना और उत्तरदायित्व का बोध कराता है। श्रावण मास की अमावस्या को मनाया जाने वाला यह उत्सव वर्षा ऋतु के मध्य धरती के नवजीवन का अभिनंदन है।

मान्यता है कि इस दिन वृक्षारोपण और पौधों की सेवा का विशेष पुण्य प्राप्त होता है। किंतु इसका वास्तविक महत्व केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि वृक्ष ही जीवन के आधार हैं। वे हमें शुद्ध वायु, जल संरक्षण, जैव विविधता और संतुलित पर्यावरण प्रदान करते हैं। यदि हर व्यक्ति अपने जीवन में एक वृक्ष लगाकर उसका संरक्षण करे, तो यह पर्व अपनी सार्थकता स्वयं सिद्ध कर देगा।

आज जब बढ़ते शहरीकरण, प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन के कारण पर्यावरण संकट गहराता जा रहा है, तब हरियाली अमावस्या का संदेश पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो उठता है। यह केवल पौधे लगाने का नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ आत्मीय संबंध स्थापित करने का अवसर है। वृक्षों की छाया में केवल धरती ही नहीं, मानव का भविष्य भी सुरक्षित रहता है।

आइए, इस हरियाली अमावस्या पर हम केवल पौधारोपण का संकल्प न लें, बल्कि लगाए गए प्रत्येक पौधे को वृक्ष बनने तक स्नेह और संरक्षण देने का दायित्व भी निभाएँ। यही प्रकृति के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धा होगी और आने वाली पीढ़ियों के लिए सबसे मूल्यवान उपहार भी।

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वन-उपवन पुलकित हो उठते,

जीवन-वीणा गाती।

प्रकृति स्वयं उत्सव बनकर,

सृष्टि-सुगंध लुटाती।।

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©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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