श्री संजय भारद्वाज
(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)
संजय दृष्टि – ब्लैक होल
तुम फिर खींच दोगे
हमारे बीच के धागे को,
तुम फिर लौट जाओगे
पिछली या उससे पिछली
या उससे पिछली
या उससे भी पिछली,
अनगिनत पिछली बार की तरह..,
तुम्हारे लौट आने पर
मैं फिर मिलूँगा तुमसे वैसे ही,
जैसे कभी कुछ हुआ ही ना हो,
कभी सोचा तुमने,
हर बार का तुम्हारा पलायन
मेरे भीतर के ब्रह्मांड में
पैदा कर देता है एक शून्य,
अब, ये सारे शून्य मिलाकर
भयावह ब्लैक होल बन चुका है,
जानते हो ना,
ब्लैक होल गड़प जाता है
ब्रह्मांड सारा का सारा,
सुनो,
हाँफ रहा हूँ, थक गया हूँ,
बार-बार गड़पे जाने से कैसे उबरूँ मैं..?
तुम्हीं बताओ
और कितने ब्रह्मांड सिरजूँ मैं..?
© संजय भारद्वाज
संध्या 5:31, दि. 25 दिसंबर 2015
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
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≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






