डॉ प्रतिभा मुदलियार
☆ संस्मरण ☆ चीन की ग्रेट वॉल- एक अद्भुत अनुभव ☆ डॉ प्रतिभा मुदलियार ☆
प्रिय अर्नेस्टा मोशा,
आज का इमेल मोशा के नाम है।
चीन जाने से बहुत पहले ही मेरे मन में उस देश के प्रति एक विशेष आकर्षण था। बचपन से ही इतिहास और यात्राओं से संबंधित पुस्तकें पढ़ने की आदत रही है। उन्हीं दिनों कभी रेशम मार्ग (Silk Route) की कथाएँ पढ़ीं, कभी बौद्ध भिक्षुओं फाह्यान और ह्वेनसांग के भारत-आगमन के वृत्तांत, तो कभी महान दीवार और निषिद्ध नगर (Forbidden City) के चित्र देखे। उन पन्नों में उभरता चीन मुझे हमेशा एक रहस्यमय, प्राचीन और अनुशासित सभ्यता के रूप में दिखाई देता था। लगता था कि यह ऐसा देश है जहाँ हजारों वर्षों का इतिहास और आधुनिक विकास एक साथ चलते हैं। भारत में रहते हुए चीन के बारे में हमारी जानकारी प्रायः कुछ निश्चित बातों तक सीमित रहती है। उसकी विशाल जनसंख्या, प्राचीन संस्कृति, चीनी मिट्टी के बर्तन, रेशम, चाय और महान दीवार। मुझे ज्ञात था कि वह संसार के सबसे अधिक जनसंख्या वाले देशों में से एक है, जहाँ करोड़ों लोग मुख्यतः मंदारिन (Mandarin) भाषा बोलते हैं। यह भी सुन रखा था कि चीनी भाषा की लिपि वर्णमाला पर आधारित न होकर चित्रात्मक चिन्हों पर आधारित है, जिसके हजारों अक्षर होते हैं। मुझे हमेशा आश्चर्य होता था कि इतनी जटिल प्रतीत होने वाली भाषा में लोग कितनी सहजता से संवाद करते होंगे। चीन के खान-पान के बारे में भी अनेक धारणाएँ थीं। नूडल्स, डम्पलिंग्स, ग्रीन टी और विविध प्रकार के व्यंजन इन सबकी चर्चा सुन रखी थी, परंतु वास्तविक चीन कैसा होगा, यह जानने की उत्सुकता बनी रहती थी। वहाँ के लोग कैसे होंगे? क्या वे उतने ही औपचारिक होंगे, जितना उनके बारे में कहा जाता है? उनकी दिनचर्या, पारिवारिक जीवन और सांस्कृतिक परंपराएँ कैसी होंगी? ऐसे अनेक प्रश्न मन में उठते रहते थे।
विश्व के प्राचीनतम सभ्यता-केन्द्रों में भारत और चीन दोनों की गणना होती है। शायद इसी कारण चीन को देखने की इच्छा केवल एक पर्यटक की जिज्ञासा नहीं थी, बल्कि एक पड़ोसी और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध राष्ट्र को निकट से समझने की आकांक्षा भी थी। जब तुमने बीजिंग में आयोजित संगोष्ठी में भाग लेने का प्रस्ताव रखा, तब मुझे लगा कि वर्षों से मन में संजोई हुई वह जिज्ञासा अब वास्तविक अनुभव में बदलने वाली है। और फिर वह दिन आया, जब विमान की खिड़की से नीचे फैली चीन की धरती पहली बार दिखाई दी। मुझे लगा जैसे इतिहास की किसी पुस्तक का एक पृष्ठ अचानक जीवंत होकर मेरे सामने खुल गया हो।
कभी-कभी कोई यात्रा हमारी स्मृतियों में केवल दृश्यों के कारण नहीं, बल्कि उनके पीछे की भावनाओं के कारण बस जाती है। बीजिंग की वह यात्रा मई की वह उजली सुबह, हवा में फूलों की महक, और मेरा उत्साह से दमकता चेहरा! आज इतने सालों बाद जब मैं याद करती हूँ, तो लगता है जैसे हम अभी-अभी उस पुराने स्टेशन से निकले हैं और सामने ग्रेट वॉल की ओर जाती बस हमारी प्रतीक्षा कर रही है।
2007 का वह समय मेरे जीवन का एक सुंदर अध्याय था। हांकुक युनिवर्सिटी ऑफ फ़ोरन स्टडीज, सियोल, वहाँ का वातावरण, विद्यार्थियों की जिज्ञासा, और मोशा तुम्हारे साथ बिताए हुए वे अनगिनत पल…आज भी मन में एक मधुर झंकार छोड़ जाते हैं। मोशा, तुम्हारे साथ घूमना, कोरिया के रीतिरिवाज़, खान-पान, उनकी विनम्र संस्कृति..सब कुछ सीखने जैसा था। और फिर, तुम्हारे कारण ही तो मुझे बीजिंग की उस संगोष्ठी में जाने का अवसर मिला था। जब हमने जाने की योजना बनाई थी, तुमने कहा था…“मई में बीजिंग बेहद सुंदर होता है, हवा में ठंडक और धूप में कोमल चमक।” वह तुम्हारी बात सच निकली। बीजिंग पहुँचते ही वह ताज़गी भरी हवा जैसे शरीर को नहीं, आत्मा को भी छू गई थी। तापमान सुखद था, पेड़ों पर नए पत्तों की हरियाली, और हर गली में खिले गुलाबी-पीले फूलों की सुगंध यह सब मिलकर बीजिंग को किसी प्राचीन कविता-सा बना रहे थे।
हमारे गेस्ट हाऊस की खिड़की से दूर-दूर तक फैली इमारतें दिखाई देती थीं। पुराने बीजिंग का सौंदर्य और आधुनिक चीन की तेज़ रफ़्तार, दोनों का अद्भुत संगम। सड़कों पर साइकिल चलाते लोग, हवा में उड़ते पतंगें, और हर मोड़ पर ताज़े सूप की खुशबू… यह सब कुछ नया और सजीव लग रहा था।
संगोष्ठी का पहला दिन समाप्त हुआ तो हमारे भीतर उत्साह दुगुना हो गया। हम बस तीन दिन के लिए आए थे.. इसलिए ग्रेट वॉल देखना हमारी चेक लिस्ट सबसे ऊपर था। अगले दिन ग्रेट वॉल देखने जाना था। सुबह-सुबह उठे… बाहर हल्की धूप और मंद हवा थी। तुम हमेशा की तरह जल्दी तैयार थीं, मुस्कुराते हुए बोलीं..“Let’s go! The Wall is waiting for us!” मैं हँस पड़ी। उस दिन हम कुल पाँच लोग थे..तुम, मैं, एक कोरियाई स्वहेली प्रोफेसर किम, और चीन के दो स्वहेली विद्यार्थी। वे दोनों उत्साहित थे कि अपने देश का यह चमत्कार हमें दिखाने का अवसर उन्हें मिला है। हमने हल्की जैकेटें, टोपी और सनग्लास पहने और बस में सवार हुए। बीजिंग से बाहर निकलते ही जैसे एक अलग संसार खुल गया.. शहर की भीड़ पीछे छूट गई और सामने फैले हरे-भरे पहाड़, जिनकी गोद में कहीं वह दीवार हमारा इंतज़ार कर रही थी।
रास्ते में तुमने बताया कि अफ्रीका में भी एक ‘ग्रेट वॉल’ की कथा प्रचलित है, पर वह दीवार नहीं, एक प्रतीक है.. लोगों के साहस और एकता का। मैंने मुस्कुराकर कहा, “और आज हम वास्तविक दीवार देखने जा रहे हैं…जो हज़ारों सालों से इतिहास की गवाही दे रही है।” जब हमारी गाडी मुड़ी और हमने पहली बार दूर से दीवार की झलक देखी, तो हम सब कुछ देर के लिए मौन हो गए। वह ग्रेट वॉल सामने थी … पहाड़ों की शृंखलाओं पर सर्प सी लिपटी हुई, हरी धूप में चमकती, समय की तरह फैली हुई।
जिस भाग की ओर हम जा रहे थे, वह ग्रेट वॉल का बादालिंग (Badaling) खंड था, जो बीजिंग से लगभग 70–80 किलोमीटर उत्तर-पश्चिम में स्थित है और राजधानी के सबसे निकट तथा सर्वाधिक लोकप्रिय भागों में गिना जाता है। चीन की महान दीवार वास्तव में एक अकेली दीवार नहीं, बल्कि विभिन्न राजवंशों द्वारा अलग-अलग कालखंडों में निर्मित दीवारों, किलों और सुरक्षा-रेखाओं का विशाल तंत्र है। इसके प्रमुख खंडों में बादालिंग, मुतियान्यू (Mutianyu), जिनशानलिंग (Jinshanling), सिमाताई (Simatai) और जियायुगुआन (Jiayuguan) विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं। आधुनिक सर्वेक्षणों के अनुसार इसकी कुल लंबाई लगभग 21,000 किलोमीटर से अधिक मानी जाती है। पहाड़ों, रेगिस्तानों, घास के मैदानों और घाटियों से होकर गुजरती यह संरचना मानो पूरे उत्तरी चीन के भूगोल को अपने भीतर समेटे हुए है। दूर से देखने पर इसकी घुमावदार रेखा सचमुच किसी विशाल अजगर की भाँति पर्वत-शृंखलाओं पर लहराती प्रतीत होती है।
इसका इतिहास भी बड़ा रोचक हैं। ग्रेट वॉल का निर्माण तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में शुरू हुआ था, जब चिन शी हुआंग ने अपने साम्राज्य को उत्तर से आनेवाले मंगोल आक्रमणों से बचाने के लिए यह दीवार बनवाई थी। उस समय इसकी लंबाई लगभग पाँच हजार किलोमीटर थी, बाद में परवर्ती राजवंशों ने इसे बढ़ाते-बढ़ाते तेरह हजार किलोमीटर से अधिक विस्तृत कर दिया। मिट्टी, ईंट और पत्थरों से बनी यह दीवार केवल सुरक्षा का प्रतीक नहीं, बल्कि मानव धैर्य और परिश्रम की अद्भुत मिसाल है। कहा जाता है कि इसके निर्माण में लाखों मजदूरों ने अपने प्राण गंवाए। उनकी स्मृति जैसे आज भी उस दीवार के पत्थरों में साँस लेती है।
यद्यपि महान दीवार के आरंभिक भाग तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में चिन सम्राट चिन शी हुआंग के शासनकाल में बनाए गए थे, परन्तु आज जो मजबूत ईंट-पत्थरों वाली दीवार दिखाई देती है, उसका अधिकांश भाग मिंग राजवंश (1368–1644) के समय निर्मित हुआ। दीवार केवल सैनिक सुरक्षा का साधन नहीं थी, यह संदेश-प्रेषण, व्यापारिक मार्गों की निगरानी और साम्राज्य की सीमाओं के नियंत्रण का भी महत्वपूर्ण माध्यम थी। प्रहरी-दुर्गों पर आग और धुएँ के संकेतों द्वारा दूर-दूर तक सूचनाएँ भेजी जाती थीं। इस दृष्टि से यह अपने समय की एक अत्यंत विकसित संचार-व्यवस्था भी थी।
दीवार की ओर बढ़ते हुए हवा में पत्तों की सरसराहट थी, ऊपर नीला आसमान, और नीचे लहराती घाटियाँ। हर मोड़ पर एक नया दृश्य… कहीं जंगली फूलों की महक, कहीं दूर से आती चिड़ियों की आवाज़। कुछ सीढ़ियाँ इतनी ऊँची थीं कि एक कदम चढ़ने में साँस फूल जाती, फिर भी हम हँसते हुए आगे बढ़ते रहे। तुम कभी आगे निकल जातीं, कभी मुड़कर कहतीं, “Come on, don’t stop! You’ll regret if you don’t reach the top!” मैं हँसते हुए जवाब देती – “I’m coming, Professor of Energy!” हमारे साथ के विद्यार्थी हँसते, फ़ोटो खींचते, कभी फूलों की पंखुड़ियाँ हवा में उड़ाते। किसी मोड़ पर जब हमने पीछे मुड़कर देखा.. दीवार पहाड़ों के बीच लहराती चली जा रही थी। वह दृश्य अविश्वसनीय था। प्रकृति और मानव निर्माण के बीच इतनी सुंदर संगति शायद ही कहीं देखी हो।
ऊँचाई पर पहुँचते ही हवा और तीखी हो गई। हम सब एक पत्थर की मेहराब के पास बैठ गए। कैमरा, मोबाइल, और मुस्कानें..सब एक साथ सक्रिय हो गए। तुम्हारे कैमरे से निकली हर क्लिक में एक कहानी थी.. कभी मैं दीवार पर खड़ी हँस रही थी, कभी तुम आसमान की ओर देखतीं मानो बादलों से बात कर रही हो।
वहीं पास में एक छोटा-सा चायघर दिखाई दिया। लकड़ी का बना हुआ, उसकी खिड़कियों से ताज़े चाय की भाप उठती दिख रही थी। हम अंदर गए.. गर्म ग्रीन टी का पहला घूँट जैसे सारी थकान को पिघला गया।
मैंने कहा, “इस स्वाद में जैसे इतिहास घुला है।” औऱ तुमने कहा, “और यादें भी।”
दीवार के ईंट-पत्थर, उनकी जोड़ाई, चौकियाँ, प्रहरी दुर्ग.. सबकुछ अत्यंत सटीक था। जहाँ-जहाँ निगरानी के लिए टॉवर बने थे, वहाँ से दूर-दूर तक फैली घाटियाँ दिखाई देती थीं। दीवार पर खड़े होकर चारों ओर दृष्टि दौड़ाने पर समझ में आता है कि इसे केवल शत्रुओं को रोकने के लिए नहीं, बल्कि साम्राज्य की सामूहिक शक्ति और संगठन का प्रतीक बनाने के लिए भी निर्मित किया गया था। शायद इसी कारण 1987 में यूनेस्को ने इसे विश्व धरोहर सूची में शामिल किया। दुनिया के लगभग हर देश से आने वाले पर्यटक यहाँ पहुँचते हैं और उन पत्थरों को स्पर्श कर उस इतिहास से जुड़ने का प्रयास करते हैं जिसने सदियों से मानव कल्पना को आकर्षित किया है।
वास्तव में यह केवल एक दीवार नहीं, बल्कि एक जीवित स्थापत्य था.. जिसमें हर युग ने अपनी छाप छोड़ी थी। कुछ स्थानों पर पत्थर पुराने और क्षीण थे, कुछ पर नए मरम्मत के निशान। धूप उन सब पर समान रूप से पड़ी थी.. मानो समय ने सबको एक-सा बना दिया हो।
तुम्हें याद है, वहाँ लगे एक शिलालेख पर लिखा था कि “जो व्यक्ति ग्रेट वॉल पर नहीं चढ़ा, वह सच्चा वीर नहीं।” यह कथन चीन में अत्यंत प्रसिद्ध है। उस समय हम मुस्कुराए थे, किंतु दीवार की ऊँची-नीची सीढ़ियाँ पार करने के बाद उसके अर्थ का अनुभव भी हुआ। वास्तव में यह केवल एक ऐतिहासिक स्मारक नहीं, बल्कि धैर्य, साहस और मानवीय संकल्प का जीवंत प्रतीक है। जब हम नीचे लौटे, शाम होने लगी थी। सूरज ढल रहा था और उसकी सुनहरी किरणें दीवार पर पड़कर उसे स्वर्णिम आभा दे रही थीं। वह दृश्य मैं आज भी नहीं भूल पाई हूँ। थकान शरीर में थी, पर मन में एक अद्भुत तृप्ति थी.. मानो शताब्दियों पुराने रहस्य को हमने स्वयं छू लिया हो। तुमने लौटते हुए कहा था.. “इतिहास किताबों में नहीं, इन पत्थरों में साँस लेता है।” मैंने धीरे से कहा.. “और हर यात्रा हमें थोड़ा और जीवित बना देती है।”
गेस्ट हाउस में लौटने के बाद हमने देर रात तक बातें कीं। कमरे में एअर-कंडीशनिंग की ठंडी हवा थी, पर बाहर की वसंत भरी रात खिड़की से झाँक रही थी। तुमने अपने देश तंज़ानिया की पहाड़ियों का ज़िक्र किया, मैंने अपने देश के ऐतिहासिक किलों का! हम दोनों ने यही सोचा कि दूरी चाहे कितनी भी हो, अनुभव हमें जोड़ देते हैं।
रात गहराती गई, और हमारी हँसी में बीजिंग की वह वसंतमयी हवा घुलती गई। आज इतने वर्षों बाद, जब मैं अपनी यात्राओं के बारे में सोचती हूँ, तो तुम्हारी और हमारी उस यात्रा की याद स्वतः लौट आती है। खुद से ही कहती हूँ कि इतिहास केवल किताबों में नहीं, बल्कि यात्राओं में, दोस्ती में और उन क्षणों में जीवित रहता है जब कोई व्यक्ति किसी नए देश की मिट्टी को अपने हाथों से छूता है। ग्रेट वॉल तो वहीं है उतनी ही भव्य, उतनी ही शांत, पर शायद अब वहाँ हमारी हँसी की गूँज भी कहीं बाकी होगी।
प्रिय मोशा, दुनिया चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हो, सच्ची दोस्ती और खोज की भावना हमें हर जगह घर जैसा एहसास देती है। कभी फिर मिलें तो चलें, किसी नई दीवार, किसी नए पहाड़ की ओर जहाँ हवा महकती हो और समय ठहर-सा जाए।
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© डॉ प्रतिभा मुदलियार
पूर्व विभागाध्यक्ष, हिंदी विभाग, मानसगंगोत्री, मैसूरु-570006
306/40, विमल विला, निसर्ग कॉलोनी, जयनगर, बेलगाम, कर्नाटक
मोबाईल- 09844119370, ईमेल: mudliar_pratibha@yahoo.co.in
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈




