श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “शहर कहाँ है?” ।)

✍ जय प्रकाश के नवगीत # १५५ ☆

☆ शहर कहाँ है? ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

तुम्हीं बताओ

शहर कहाँ है?

अभी यहीं था

गया कहाँ है ।

 

घर सारे बन गए दुकानें

विज्ञापन से ढके मोहल्ले

शहद घुली खो गईं बोलियाँ

पसर गए कर्कश हो-हल्ले

कुछ तो बोलो

आम आदमी

आख़िर क्यों

लाचार यहाँ है ।

 

तीरथ गुंडे घट-घट व्यापे

चौराहों पर रोज़ प्रदर्शन

मठाधीश के आदेशों पर

ठग मंडल के भजन कीर्तन

चौपट सारी

हुई व्यवस्था

मूक बधिर

कानून जहाँ है ।

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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