डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे  आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं। आज  प्रस्तुत है एक  लघुकथा   ‘मेरे ख़ैरख़्वाह’।  इस हास्य कथा के लिए डॉ परिहार जी के सेन्स ऑफ़ ह्यूमर और लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # 73 ☆

☆ लघुकथा – मेरे ख़ैरख़्वाह

 सबेरे आठ बजे दरवाज़े की घंटी बजी। खोला तो सामने मल्लू था। मुझे देखकर उसने ज़ोर से, जैसे आश्चर्य से, ‘अरे’ कहा और फिर दौड़ कर मुझसे लिपट गया। मैंने घबरा कर उसे पीछे ढकेला, कहा, ’ए भाई, कोरोना काल में लिपटना चिपटना सख़्त मना है। उधर बैठ।’

वह और ज़्यादा मेरी छाती से चिपक गया, विनती के स्वर में बोला, ’थोड़ी देर रुक जाओ, भैया। बड़ी राहत महसूस हो रही है।’

जैसे तैसे उसे अलग करके पूछा,’सबेरे सबेरे इतना इमोशनल क्यों हो रहा है भाई?’

वह सोफे पर बैठकर बड़े भावुक स्वर में बोला,’बात यह है भैया, कि रात को आपके बारे में बहुत बुरा सपना देखा। तीन बजे जो नींद खुली तो सुबह तक चिन्ता के मारे जागता ही रह गया। रात भर दिल में धुकधुक होती रही। यहाँ डरते डरते आया कि पता नहीं क्या देखने को मिले। पता नहीं आपसे भेंट होगी या नहीं। आपको देखा तो जान में जान आयी।’

मैंने हँसकर कहा,’चलो कोई बात नहीं। कहते हैं किसी की मौत की झूठी खबर फैलने से उसकी उम्र बढ़ जाती है।’

मल्लू बोला,’ठीक कहते हैं, लेकिन मैं इसलिए परेशान हूँ कि मेरे सपने अक्सर सच निकलते हैं। मैंने अपने चाचाजी के बारे में ऐसा ही सपना देखा था। दो दिन बाद ही वे चल बसे थे।’

मैंने जवाब दिया,’चिन्ता मत करो। मेरा ब्लड प्रेशर ठीक है। शुगर वुगर भी नहीं है। हाथ पाँव दुरुस्त हैं।’

वह बोला,’आपके मुँह में घी शक्कर, लेकिन सपने के हिसाब से दस बीस दिन चिन्ता तो रहेगी। मैं फोन करके हालचाल  लेता रहूँगा।’

थोड़ी देर बैठने के बाद वह बोला,’अब चलता हूँ, लेकिन मेरा चित्त इधर ही लगा रहेगा। वैसे तो सब ठीक है, लेकिन सपने की वजह से खटका होता है। सब कुछ नार्मल होने के बावजूद लोग बैठे बैठे लुढ़क जाते हैं।’

मैंने तिरछी नज़र से दाहिने बायें देखा कि परिवार का कोई सदस्य मल्लू भाई के शुभ वचन न सुन रहा हो। सौभाग्य से वहाँ कोई नहीं था।

वह उठ खड़ा हुआ, फिर हाथ जोड़कर बोला, ’आप ऐसा मत समझना कि मैं आपके लिए बुरा सोचता हूँ। मैं तो उस सपने की वजह से परेशान हूँ।’

मैंने कहा,’चिन्ता मत करो। मैं तुम्हारी बात समझता हूँ। मैं घर में बता दूँगा कि मेरी तबियत गड़बड़ होने पर तुम्हें फोन कर दें। देखते हैं तुम्हारे सपने में कितना दम है।’

वह एक बार और हाथ जोड़कर बाहर हो गया।

 

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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