डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं  स्त्री विमर्श पर आधारित एक विचारणीय लघुकथा सत्य- की- राह)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # 236 – साहित्य निकुंज ☆

☆ सत्य- की- राह ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

सलोनी ने अपने माता-पिता की मर्जी के खिलाफ अनमोल से शादी की थी। माता-पिता ने भी ज़्यादा कुछ नहीं बोला उन्होंने मंदिर में शादी कर दी। सलोनी के अलावा उनकी चार बेटियाँ और है। उन्होंने सोचा कोई बात नहीं अगर यह चाहती है तो उसे अपनी इच्छा करने दो जो होगा देखा जाएगा। 4 वर्ष हो गए शादी को एक बेटी भी है जिन्दगी खुशहाल है।

अनमोल और सलोनी दोनों की उम्र करीब 22-23 वर्ष की है। अनमोल किसी छोटी कंपनी में काम करता है और अपनी रोजी-रोटी दिल्ली में चलाता है। अभी कुछ दिन पहले परिवार की एक शादी में उससे मुलाकात हुई।

अवकाश के दिन पुरानी कंपनी के बॉस उसके घर आए और उससे कहा – “कि तुमने काम क्यों छोड़ा है इतना बढ़िया काम इतना अच्छा पैसा तुम्हें कहाँ मिलेगा।” अनमोल ने कहा – “नहीं सर मैंने दूसरी कंपनी ज्वाइन कर ली है मैं वह काम नहीं कर सकता।” थोड़ी देर बाद सलोनी चाय बनाकर लाती है और बॉस को नमस्ते कर अंदर चली जाती है। तभी उन्होंने मेरी बीवी को देखा और मुझसे कहा- “इतना बढ़िया खजाना तुमने घर में छुपा रखा है इसे क्या शोकेस में सजाओगे।” सर जब हमने शादी की थी तब मेरा मकसद कुछ और था लेकिन जैसे ही सलोनी की संगत मुझे मिली मेरा मन बदल गया मेरी आत्मा ने मुझे धिक्कारा लड़कियाँ सप्लाई करने का मैं यह ग़लत काम कभी नहीं करूंगा। ठीक है ठीक है तुमने जो सोचा सही सोचा होगा। अगर कभी मन परिवर्तन हो तो तुम्हारे लिए दरवाजे खुले हैं।

अनमोल मन ही मन सोच रहा था कहीं सलोनी ने हम दोनों की बातें न सुन ली हो।

बॉस के जाने के बाद सलोनी अपनी बेटी को लेकर बाहर आती है और कहती है- “आज मैं ईश्वर का शुक्रिया अदा कर रही हूँ मैं गंदगी में जाने से बची और तुमने सत्य की राह पर चलने का निर्णय लिया।” अनमोल सलोनी की बात सुनकर निशब्द—-हो गया।

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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