सुश्री ऋता सिंह
(सुप्रतिष्ठित साहित्यकार सुश्री ऋता सिंह जी द्वारा ई- अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों के लिए अपने यात्रा संस्मरणों पर आधारित आलेख श्रृंखला को स्नेह प्रतिसाद के लिए आभार। आज प्रस्तुत है आपकी डायरी के पन्ने से … – लघुकथा – संवेदनशीलता और समर्पण।)
मेरी डायरी के पन्ने से # 41 – लघुकथा – संवेदनशीलता और समर्पण
निराली आई टी प्रोफ़ेशनल है। उसमें आइडिया की कोई कमी नहीं है। अपनी कंपनी की कई पार्टियाँ वही एरेंज भी करती है। साथ ही एक अच्छी माँ और गृहणी भी है। परिवार और समाज के प्रति संपूर्ण समर्पित।
उसकी बेटी यूथिका का अब इस वर्ष दसवाँ जन्मदिन था। वह कुछ हटकर करना चाहती थी।
जिस विद्यालय में युथिका पढ़ती है वह धनी वर्ग के लिए बना विद्यालय है। ऐसा इसलिए क्योंकि वहाँ की वार्षिक फीस ही बहुत अधिक है जो मध्यम वर्गीय लोगों की जेब के बाहर की बात है।
युथिका की कक्षा में तीस बच्चे हैं। सबके जन्म दिन पर ख़ास उपहार लेकर वह घर आया करती है। युथिका के हर जन्मदिन पर निराली भी बच्चों को अच्छे रिटर्न गिफ्ट्स दिया करती है। पर इस साल युथिका के जन्म दिन पर निराली ऐसा कुछ करना चाहती थी कि बच्चों को समाज के अन्य वर्गों से जोड़ा जा सके।
उसने एक सुंदर ई कार्ड बनाया। जिसमें लिखा था –
युथिका के दसवें जन्म दिन का उत्सव आओ साथ मनाएँ।
युथिका के दसवें जन्म दिन पर आप आमंत्रित हैं। आप अपने छोटे भाई बहन को भी साथ लेकर आ सकते हैं। उपहार के रूप में अपने पुराने खिलौने जो टूटे हुए न हों, जिससे आप खेलते न हों और आपके वस्त्र जो फटे न हों उन्हें सुंदर रंगीन काग़ज़ों में अलग -अलग पैक करके अपना नाम लिखकर ले आएँ। कोई नया उपहार न लाएँ।
नीरज -निराली चतुर्वेदी
और परिवार।
समय संध्या पाँच से सात बजे
‘सागरमंथन’ कॉलोनी
304 कल्पवृक्ष
मॉल रोड
जन्म दिन के दिन तीस बच्चे जो युथिका की कक्षा में पढ़ते थे और वे छात्र जो उसके साथ बस में यात्रा करते थे सभी आमंत्रित थे।
जन्म दिन के दिन पूरे घर को फूलों से और कागज़ की बनी रंगीन झंडियों से सजाया गया।
पर्यावरण को ध्यान में रखते हुए गुब्बारों का उपयोग नहीं किया गया।
वक्त पर बच्चे आए। अपने साथ दो- दो पैकेट उपहार भी लेकर आए। कुछ बच्चे अपने छोटे भाई बहनों को साथ लेकर आए। उनके हाथ में भी दो -दो पैकेट थे।
उस दिन शुक्रवार का दिन था। खूब उत्साह के साथ जन्मदिन का उत्सव मनाया गया। सबसे पहले युथिका की दादी ने दीया जलाया, दादा और दादी ने उसकी आरती उतारी। निराली ने हर बच्चे के हाथ में गेंदे के फूल पकड़ाए। जन्म दिन पर गीत गाया गया। दादी ने युथिका को खीर खिलाई। बच्चों ने युथिका के सिर पर फूल बरसाए। सबने ताली बजाई।
युथिका के घर में केक काटने की प्रथा नहीं थी। इसलिए बच्चों को इसकी अपेक्षा भी नहीं थी।
पासिंग द पार्सल खेल खेला गया। उसके अनुसार बच्चों ने गीत गाया, कविता सुनाई, नृत्य प्रस्तुत किया, चुटकुले सुनाए, जानवरों की आवाज़ सुनाई। सबने आनंद लिया।
हर बच्चे को रिटर्न गिफ्ट के रूप में ब्रेनविटा नामक खेल उपहार में दिया गया।
पचहत्तर नाम लिखे हुए उपहार रंगीन कागज़ों में रिबन लगाकर युथिका को दिए गए। उसके जीवन का यह नया मोड़ था।
दूसरे दिन सुबह निराली उसके पति नीरज और युथिका बच्चों के कैंसर अस्पताल पहुँचे। युथिका के हाथ से हर बच्चे को खिलौने दिए गए जो उसके मित्र उपहार स्वरूप लाए थे। साथ में हर बच्चे को नए उपहार के रूप में तौलिया, साबुन, टूथ ब्रश, कहानी की पुस्तक, स्कैच पेंसिल और आर्ट बुक दिए गए। युथिका हरेक से बहुत स्नेह से मिली। उपहार देते समय वह बहुत खुश हो रही थी। हर बच्चा खिलौना पाकर खुश था।
बच्चों की खुशी की सीमा न थी। वे झटपट पैकेट खोलकर खिलौने देखने लगे। उनके चेहरे खिल उठे।
वहाँ से निकलकर वे तीनों आनंदभवन गए। यह अनाथाश्रम है। यहाँ के बच्चों के बीच उम्र के हिसाब से वस्त्र के पैकेट बाँटे गए।
उस दिन सारा दिन युथिका अस्पताल की चर्चा करती रही। हमउम्र बच्चों को अस्पताल के वस्त्रों में देखकर और बीमार हालत में देखकर वह भीतर से थोड़ी हिल उठी थी। पर निराली काफी समय से उसे मानसिक रूप से तैयार भी करती जा रही थी कि जीवन सबके लिए आरामदायक और सुंदर नहीं होता।
निराली यहीं नहीं रुकी वह रविवार के दिन पुनः अस्पताल गई। वहाँ के हर बच्चे ने खिलौना पाकर देने वाले के नाम पर एक पत्र लिखा था और यह लिखवाने का काम अस्पताल के सहयोग से ही हुआ था। निराली सारे थैंक्यू पत्र लेकर आई।
अपनी बेटी को भविष्य के लिए तैयार करने के लिए वह अभी से प्रयत्नशील है। वह इस दसवें जन्म दिन की तैयारी के लिए अस्पताल से, बच्चों की माताओं से काफी समय से बातचीत करती आ रही थी।
अगले दिन अपने दफ्तर जाने से पूर्व वह विद्यालय गई। प्रिंसीपल के हाथ में वे थैंक्यू पत्र सौंपकर आई। प्रिंसीपल इस पूरी योजना और आयोजन के लिए निराली की खूब प्रशंसा करते रहे।
शाम की एसेंबली में हर बड़े छोटे विद्यार्थी का नाम लेकर थैंक्यूपत्र दिया गया। यूथिका के घर उसके जन्मदिन के अवसर पर जो छात्र अपना खिलौना देकर आए थे वे अपने नाम का पत्र पाकर अत्यंत प्रसन्न हुए। युथिका के नाम पर भी पत्र था।
अब पत्र व्यवहार का सिलसिला चलता रहा और छात्र अस्पताल के बच्चों के साथ जुड़ते चले गए।
समाज के हर वर्ग को जोड़ने के लिए किसी न किसी को ज़रिया तो बनना ही पड़ता है। इसके लिए संवेदनशीलता और समर्पण की ही तो आवश्यकता होती है। समाज में और कई निराली चाहिए।
© सुश्री ऋता सिंह
24/10/24
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बहुत सुंदर। बधाई।