आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी रचना  ”  विश्व में कविता समाहित या कविता में विश्व?”। )

 ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # 4 ☆ 

☆  विश्व में कविता समाहित या कविता में विश्व? ☆ 

 

विश्व में कविता समाहित

या कविता में विश्व?

 

देखें कंकर में शंकर

या शंकर में प्रलयंकर

नाद ताल ध्वनि लय रस मिश्रित

शक्ति-भक्ति अभ्यंकर

अक्षर क्षर का गान करे जब

हँसें उषा सँग सविता

तभी जन्म ले कविता

 

शब्द अशब्द निशब्द हुए जब

अलंकार साकार हुए सब

बिंब प्रतीक मिथक मिल नर्तित

अर्चित चर्चित कविता हो तब

सत्-शिव का प्रतिमान रचे जब

मन मंदिर की सुषमा

शिव-सुंदर हो कविता

 

मन ही मन में मन की कहती

पीर मौन रह मन में तहती

नेह नर्मदा कलकल-कलरव

छप्-छपाक् लहरित हो बहती

गिरि-शिखरों से कूद-फलाँगे

उद्धारे जग-पतिता

युग वंदित हो कविता

 

२१-३-२०२०

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संजीव
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रचना प्रकाशन हेतु आभार।