श्री संतोष नेमा “संतोष”
(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपके – बाढ़ पर कुछ दोहे… । आप श्री संतोष नेमा जी की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)
☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # २७५ ☆
☆ बाढ़ पर कुछ दोहे… ☆ श्री संतोष नेमा ☆
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जन – जीवन भयभीत है, उजड़ गए खलिहान |
पशु- पक्षी व्याकुल हुए, टूट रहे अरमान ||
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निगल रही यह बाढ़ भी, घर- गृहस्थ सामान |
बहे जानवर बाढ़ में, दुखी हुआ इंसान ||
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चौतरफा इस बाढ़ ने, लिया सभी को लूट |
जाने कब इस दर्द से, हमें मिलेगी छूट ||
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इस बारिश में गिर गए, कितने सेतु धड़ाम |
पर सत्ता ने मढ़ दिया, वर्षा पर इल्ज़ाम ||
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टूटा पुल रोकर कहे, मुझे न देना दोष |
पकड़ें उसको खोज के, जिसने खाया कोष ||
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नदियाँ पागल सी हुईं, खूब बढ़ा सैलाब |
आँखों में ही खो गए, टूटे सारे ख्वाब ||
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शिखर फिसल कर गिर रहे, नदियाँ करें कटाव |
नालों में भी आ गया, बारिश भरा बहाव ||
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दिखे हर तरफ त्रासदी, खड़ा प्रशासन मौन |
जन -जन की यह वेदना, यहाँ सुनेगा कौन ||
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छेड़ -छाड़ अब छोड़िए, करें नियति सम्मान |
होगा तब संतोष को, वृहद खुशी का भान ||
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© संतोष कुमार नेमा “संतोष”
वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार
आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 7000361983, 9300101799
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





