श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव
(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ “जय प्रकाश के नवगीत ” के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “अपने से ही एक युद्ध” ।)
जय प्रकाश के नवगीत # १२५ ☆ अपने से ही एक युद्ध ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆
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वह आँखों में लिए सपने
निकल पड़ा है सड़कों पर
उसके सीने में मची हुई है हलचल
प्यार के रंग में सना हुआ
कुछ बन पाने की चाह लिए
एक उत्साह और उमंग के साथ
कि मिलेगी उसे भी मंजिल
पैरों से मिट्टी को उछालता हुआ
अपने वजूद के सामने बौना करता
दुनिया के तमाम अवरोधक
और सहसा बिखर गया वह सपना
टूट गईं उम्मीद की वे लड़ियाँ
आज वह सिर्फ़ एक चेहरा है
जो अक्सर भीड़ में खोकर भी
बहुत अकेला है
अब न उसके पास सपने हैं
और न ही वे आँखें जिन में समाई थी
सारी कायनात संपूर्ण सृष्टि
वह लड़ रहा है अपने से ही एक युद्ध
निरंतर साँसों के शेष होने तक
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© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव
सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)
मो.07869193927,
≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈




