स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’
(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी द्वारा रचित – “कविता – सबके भगवान तो एक ही हैं…” । हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।)
☆ काव्य धारा # २५५ ☆
☆ सबके भगवान तो एक ही हैं… ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆
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दुनियाँ है बड़ी बिखरी सी कड़ी, पर सबकी बनावट एक सी है
हर रोज छटा नई होती है पर धरती की सजावट एक सी है।।
जलथल नभ ताप पवन मौसम सारी दुनियाँ में एक से हैं
रोना गाना खुशियाँ औ गम, हर देश में सबके एक से हैं ।।
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पूरब पश्चिम हो देश कोई इन्सान की सूरत एक सी है
गति मति रति चाल चलन जीवन की जरूरत एक सी है।।
दिन रात सुबह और शाम कहीं भी हों, सब होते एक से हैं
सब सूरज, चाँद सितारों के संग जगते और सोते एक से हैं।।
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संसार में हर एक प्राणी की अपनी सक्रियता एक सी है
है साफ इसी से इस सारी दुनियाँ का रचियता एक ही है ।।
है तथ्य यही है तत्व वही उसे राम कहो या रहीम कहो
रब, वाहे गुरु, अल्लाह, मसीह, जरश्रुस्त या कृष्ण, करीम कहो ।।
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जो जैसा चाहे ध्यान करे, पूजा अर्चन या याद करे
मंदिर मस्जिद गिरजा गुरुद्वारे में जाके अरदास करे।।
जब तत्व है एक तो भेद कहाँ ? उसका सन्मान तो एक ही है
साकार हो या आकार रहित जग का भगवान तो एक ही है ।।
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अपने अज्ञान के चक्कर में, हम अलग नाम ले फूले हैं
रंग रूप धर्म या बोली के फिरकों में बँट कर भूले हैं ।।
भूले राही अब राह पै आ जग के इन्सान तो एक ही हैं
हमने ही उसे कई नाम दिये सबके भगवान तो एक ही हैं।।
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© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’
साभार – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’
ए २३३ , ओल्ड मीनाल रेजीडेंसी भोपाल ४६२०२३
मो. 9425484452
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





