श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”
संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी के साप्ताहिक स्तम्भ “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “सत्ता का भोगी बुरा…”। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।
मनोज साहित्य # २०६ – सत्ता का भोगी बुरा… ☆
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सत्ता का भोगी बुरा, जिसको चढ़ा खुमार।
नैतिकता को भूलकर, भरते रहे डकार।।
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सतयुग में सुर औ असुर, रहे केन्द्र के बिन्दु।
ब्रम्हा विष्णु महेश ही, बने कृपा के सिन्धु ।।
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त्रेता में श्री राम ने, किया दशानन युद्ध।
संकटमोचन बन गये, किया धरा को शुद्ध।।
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अजुद्धा में श्री राम को, मिले भरत से भ्रात।
रामराज्य की कल्पना, के सर्जक थे तात।।
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द्वापर में पलटा समय, त्रेता को दी मात।
सिंहासन अंधा हुआ, पुत्र मोह में तात।।
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स्वार्थों में सब खो गये, अंध भक्ति का शोर।
दुर्योधन धृतराष्ट्र से, हुयी अनोखी भोर।।
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मान और अपमान का, चला अनोखा दौर।
नीति अनीती भूलकर, हुये सिंहासन खोर।।
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भरी सभा में द्रोपदी, किया वस्त्र से हीन।
जनता की न पूछिये, स्थितियाँ थीं दीन।।
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तब द्वापर में कृष्ण ने, किये अनोखे काम।
सभी विधर्मी का किया, पूरा काम तमाम।।
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जबसे कलियुग आ गया, फिर से छाया रोग।
नर-नारी के भाग्य में, बस कष्टों का भोग।।
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सत्ता की चाहत बुरी, भूलें नैतिक राह।
परहित भाव बिसारते, जग से बेपरवाह।।
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यवनकाल में तो मचा,जग जाहिर कुहराम।
पिता-पुत्र नाते सभी, बुरे हुये बदनाम।।
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धर्मान्धों की फौज ने, कर दी बगिया सून।
सिंहासन की चाह में, खूब बहाया खून।।
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अंगे्रजों के काल में, खूब मची थी लूट।
जितना चाहे लूट लो, उनको ही थी छूट।।
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स्वतंत्रता जब मिल गई, थामी हमने डोर।
तब भारत को था लगा, अब तो होगी भोर।।
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भ्रष्टाचार अचार का, लगा अनोखा स्वाद।
जिसको देखो खा रहा, चारों ओर विवाद।।
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कालान्तर में शक्तियाँ, प्रखर हुयीं दिन रात।
लम्पट चोर मवालि की, चारों ओर बिसात।।
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निज स्वार्थों की भीड़ ने, किये अनोखे काम।
खुद का घर भरने लगे, कैसे लगे विराम।।
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आजादी के साथ में, बटवारे का शोर।
धरा रक्त से रंग गई, तब आयी थी भोर।।
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लोकतंत्र की त्रासदी, आरक्षण का जोर।
अगड़े पिछड़े सब खड़े, मचा रहे हैं शोर।।
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तुष्टिकरण की नीति से, बिगड़ी सारी सोच।
समीकरण सब रूठते, सबके मन संकोच।।
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नेताओं की डुगडुगी, बजती है हर बार।
बंदर से सब नाचते, जब सजता दरबार।।
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आशायें सबकी लगीं, कब बदलेगा तंत्र।
तिमिर हटे इस देश का, तब गूँजेगा मंत्र।।
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रामराज्य की आस में, बैठा है इंसान।
भेद भाव का अंत हो, बदले हिंदुस्तान।।
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© मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”
संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002
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