आचार्य भगवत दुबे
(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे।
इस सप्ताह प्रस्तुत हैं “साँड़ तकादों के“।)
साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १३३ – साँड़ तकादों के ☆ आचार्य भगवत दुबे
☆
न्याय माँगने, गाँव हमारे, जब तेहसील गये,
न्यायालय, खलिहान, खेत,
घर गहने लील गये!
लिया कर्ज़,
सम्भावनाओं की फसल गयी बोई,
फलीभूत आशा के होते, लगा रोग कोई।
साँड़ तकादों के, लठैत
खेतों में ढील गये
गिरवी रखा
अँगूठा, करने बेटी का गौना,
छोड़ पढ़ाई हरवाही करने निकला छौना।
चिन्ताओं के बोझ, सुकोमल
काँधे छील गये
उर्वर की,
भूदान यज्ञ वाली ज़मीन पड़ती,
हरियाली शहरी आँखों में, सदा रही गड़ती।
फिर कछार कांक्रीट वनों में
हो तब्दील गये
नफ़रत से
तिमिराच्छादित दिखती है गली-गली,
उच्छृंखल धर्मान्धताओं की ऐसी हवा चली।
प्रेम और सद्भावनाओं के
बुझ कन्दील गये
कभी न
छँट पाया, जीवन से विपदा का कुहरा,
राजनीति का, जिन्हें बनाया गया सदा मुहरा।
दिल्ली, लोक कला दिखलाने
भूखे भील गये
☆
https://www.bhagwatdubey.com
© आचार्य भगवत दुबे
३ दिसंबर २०१२
82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






बेहतरीन अभिव्यक्ति