सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’
(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – मिलन की आस…।
रचना संसार # ७९ – गीत – मिलन की आस… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’
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अन्तर्मन में प्रियतम बसते,
नवल जगी प्रिय प्यास।
उलझा बाहुपाश में मनवा,
हृदय मिलन की आस।।
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महके बेला गंधिल क्यारी,
मधुर कलश मकरंद।
मंजुल मुखी रूप रति मोहे,
मधुमासी आनंद।।
महुआ किंशुक गुलमोहर ने,
लिखे प्रेम अनुप्रास।
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अन्तर्मन में प्रियतम बसते,
नवल जगी प्रिय प्यास।।
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चंदन काया दिव्य सुवासित,
दे आमंत्रण भान।
सम्मोहित सब चपल चंचला,
अवगुंठित पट जान।।
इन अधरों की पढ़ लो पाती,
सुखद मिले आभास।
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अन्तर्मन में प्रियतम बसते,
नवल जगी प्रिय प्यास।।
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चहुँदिशि है प्रतिबिंब प्रेम का,
क्षण संदल अभिसार।
प्रतिभासित कोमल सुदीप्त भी,
यौवन की रसधार।।
करे समर्पण तन-मन अपना,
डोर थाम विश्वास।
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अन्तर्मन में प्रियतम बसते,
नवल जगी प्रिय प्यास।।
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मेघावरी ललित प्रिय अलकें,
अनुपम अंजन धार।
दृष्टि-वाण से करती घायल,
दो आलिंगन हार।।
बजती मादक शहनाई भी,
आलोकित मधुमास।
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अन्तर्मन में प्रियतम बसते,
नवल जगी प्रिय प्यास।।
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© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’
(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)
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