स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व  प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  द्वारा रचित – “कविता  – भारत परम पुरातन प्रिय देश है हमारा…” । हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।) 

☆ काव्य धारा # २५७ ☆

☆ ।। भारत परम पुरातन प्रिय देश है हमारा ।। ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

☆

भारत परम पुरातन प्रिय देश है हमारा

दुनियाँ सराहती है इसकी विचार धारा ।

*

भावों की भव्यता देता इसे हिमालय

मन को पवित्र रखती गंगा की पुण्य धारा

* 

वातावरण यहाँ का जन जन को मोह लेता

जो भी यहाँ पे आया वह हो गया हमारा।

*

हर देश, धर्म, भाषा संस्कृति को मान देना

हिल मिल के सबसे रहना, संदेश है हमारा ।

*

सुख- शांति से रहे सब जो भी यहां पे आये

बढ़ता रहा निरन्तर आपस का भाई-चारा

*

हम प्रेम के पुजारी वसुधा कुटुम्ब हमारा

पारस्परिक समन्वय शुभ मंत्र है हमारा ।

*

सर्वे भवन्तु सुखिनः निर्भय तथा निरामय

यह कामना हमारी जीवन का सहज नारा ।

*

जिसने हमें पुकारा, सहयोग कोई चाहा

उसके लिये निरन्तर उपलब्ध हर सहारा ।

*

सत्य न्याय के हर युग से रहे पुजारी

जो मानता है इनको वह मित्र है हमारा ।

*

सम्पन्न हुई कल जो ट्रेड डील फाइनल

जग के भविष्य को, देगी वो बड़ा सहारा

*

दुनियाँ ने एक स्वर से प्रस्ताव सब जो माने

उससे हुआ प्रकाशित भारत-सुयश सितारा ॥

☆

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

साभार – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

ए २३३ , ओल्ड मीनाल रेजीडेंसी  भोपाल ४६२०२३

मो. 9425484452

vivek1959@yahoo.co.in

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares
0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

0 Comments
Oldest
Newest Most Voted