श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव
(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ “जय प्रकाश के नवगीत ” के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “नदी नहाने जाती है ” ।)
जय प्रकाश के नवगीत # १३२ ☆ नदी नहाने जाती है ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆
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उल्टा चलन सिखाती है
नदी नहाने जाती है ।
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राह मील के पत्थर पर
बैठ ज़रा सुस्ताती है ।
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दुख का बोझ उठाने पर
ख़ुशी होंठ पर आती है ।
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सपने रखकर सिरहाने
रात नींद में गाती है ।
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जुर्म अदालत सुनती है
सज़ा नहीं दे पाती है ।
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© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव
सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)
मो.07869193927,
≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





