आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’
(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि। संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है – प्रात-गीत।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २६६ ☆
☆ प्रात-गीत ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆
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सपने देखे सुंदर सुंदर
अब जग जाएँ रे!
भोर भई उठ जग को
मंगल गान सुनाएँ रे!
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करतल बसते हैं विधि-हरि-हर
सुमिर प्रणाम करो रे सादर।
शारद-उमा-रमा में रमकर
नमन करो भू-नभ को, पगधर
सुख दे-पाएँ रे!
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चित्रगुप्त प्रभु का मन-मंदिर
कर्म देव का यह तन है घर
काम करें हर प्रभु-अर्पण कर
फल जो-जितना उचित मानकर
प्रभु-यश गाएँ रे।
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पंछी नाचें फुदक-चहककर
फूल खिल रहे नित्य महककर
हम क्यों दुर्बल व्यर्थ फिक्रकर
जीवन जैसा जिएँ हर्षकर
खुशी मनाएँ रे!
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© आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’
१.२.२०२६
संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,
चलभाष: ९४२५१८३२४४ ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈




