श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता तुम जो मिली…”।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २५१ ☆

☆ # “तुम जो मिली…” # ☆

चलते चलते एक राह मिल गई

जीने की एक चाह मिल गई

हाथ थामने एक बांह मिल गई

तुम जो मिली संसार मिल गया

जीने का आधार मिल गया

 

मैं आकाश में उड़ने लगा

चांद तारों से जुड़ने लगा

नए सपनों की तरफ मुड़ने लगा

तुम जो मिली प्यार मिल गया

जीने का आधार मिल गया

 

मन की वाटिका में फूल खिलने लगे

तितलियों के संग तन मिलने लगे

देख देख आवारा भंवरें जलने लगे

तुम जो  मिली उपहार मिल गया

जीने का आधार मिल गया

 

नई कोपलें फूटने लगी

नई उमंगे जुटने लगी

नई तरंगे उठने लगी

तुम जो  मिली घर बार मिल गया

जीने का आधार मिल गया

 

नदी सागर सा प्यार है

उठती लहरों सा ज्वार है

टूटती रूढ़ियों की कगार है

तुम जो  मिली एतबार मिल गया

जीने का आधार मिल गया

 

हृदय में मधुर मधुर सा स्पंदन है

पलकों में सागर सागर सा अभिनंदन है

निराकार को कोटि-कोटि वंदन है

तुम जो मिली पुरस्कार मिल गया

जीने का आधार मिल गया /

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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