श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “माँ की ममता है बड़ी। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २०९ – सजल – एक-एक कर बिछुड़े अपने ☆

माँ की ममता है बड़ी, जिसका ओर न छोर।

नव जीवन देकर यही, दिखलाती है भोर।।

*

संस्कार की वह घुटी, रोज पिलाती घोंट।

मानव बनकर ही रहे, कहीं न आये खोट।।

*

बचपन में देती रही, भले बुरे का ज्ञान ।

मन में जिसने गुन लिया, दूर हटा अज्ञान।।

*

बेटा कितना भी बड़ा, नजरों में नादान।

माँ तो नजर उतारती, वह चाहे कल्यान।।

*

ममता करुणा प्रेम की, शीतल भरी फुहार।

जीवन भर देती सदा, कुशल क्षेम उपहार।।

*

उसके आर्शीवाद से, बनते जग में भूप।

प्यार मिले माँ का जिसे, कभी चुभे ना धूप।।

*

किस्मत के होते धनी, जिसको मिलती छाँव।

कभी भटकते हैं नहीं, मिल जाती है ठाँव।।

*

उसका सँग जब तक रहा, सुख का था अंबार।

उसके जाते ही लगा, सूना सा घर द्वार।।

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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