श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”
संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी के साप्ताहिक स्तम्भ “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “माँ की ममता है बड़ी…”। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।
मनोज साहित्य # २०९ – सजल – एक-एक कर बिछुड़े अपने ☆
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माँ की ममता है बड़ी, जिसका ओर न छोर।
नव जीवन देकर यही, दिखलाती है भोर।।
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संस्कार की वह घुटी, रोज पिलाती घोंट।
मानव बनकर ही रहे, कहीं न आये खोट।।
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बचपन में देती रही, भले बुरे का ज्ञान ।
मन में जिसने गुन लिया, दूर हटा अज्ञान।।
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बेटा कितना भी बड़ा, नजरों में नादान।
माँ तो नजर उतारती, वह चाहे कल्यान।।
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ममता करुणा प्रेम की, शीतल भरी फुहार।
जीवन भर देती सदा, कुशल क्षेम उपहार।।
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उसके आर्शीवाद से, बनते जग में भूप।
प्यार मिले माँ का जिसे, कभी चुभे ना धूप।।
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किस्मत के होते धनी, जिसको मिलती छाँव।
कभी भटकते हैं नहीं, मिल जाती है ठाँव।।
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उसका सँग जब तक रहा, सुख का था अंबार।
उसके जाते ही लगा, सूना सा घर द्वार।।
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© मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”
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