श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “भोले का अभिषेक”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २५५ ☆

🌻 लघु कथा 🌻 भोले का अभिषेक 🌻

महाशिवरात्रि की धूम, भक्तों की टोली यत्र- तत्र, शिवालय, देवालय घर मंदिर, सजा सुंदर, चमकता जहाँ तक दृष्टि जाए हर- हर महादेव की गूंज।

दूध दही, गंगाजल निर्मल जल की धार, अभिषेक करने की होड़ सी मची है। शिव शंकर भक्तों की परीक्षा ले रहे हैं। सब उनका मायाजाल।

अरे जल्दी चलो नहीं जाना है क्या? मालती।

जल्दी चलो– शिव अभिषेक करने का समय हो चला है। पास के मंदिर में बहुत भीड़ होने लगी है।

सखी ने जोर से आवाज लगाई।

नहीं अभी नहीं जा रही हूँ। घर मंदिर में अभिषेक कर लूँ तत्पश्चाप जाऊंगी।

तू तो पगली है घर में बाद में करते रहना। पहले चल वहाँ हो आते हैं। बहुत अच्छा पुण्य मिलता है। नहीं तो  मंदिर में बहुत भीड़ हो जाएगी।

नहीं मेरे मंदिर में सभी देवगण बैठे इंतजार करते हैं। सभी को मेरे अभिषेक की आवश्यकता है।

सखी आँखें तरेर कर बोली– ऐसे कह रही है– जैसे भगवान इसके घर पर हैं।

मालती ने कहा सही कहा तुमने। चाय, दूध, नाश्ता, टिफिन, कपड़े की तैयारी, स्कूल की तैयारी, भोजन व्यवस्था, झाड़ू बुहार, साफ सफाई समय पर नहीं हुआ तो मेरे अभिषेक का क्या महत्व।

मेरे पतिदेव ने सारा कुछ मुझे सौप दिया है। अपनी जिम्मेदारी उठा परिवार को खुश रखने के लिए दिन-रात परिश्रम करते हैं।

कहते-कहते वह भाव विभोर होने लगी। आज पतिदेव उठकर भोर एक लोटा जल सूर्य देव अर्पण करते कह रहे थे – – – प्रभु मेरी मालती को सदैव कुशल रखना। हे अर्धनारीश्वर बस यही मेरा अभिषेक है।

और वह सखी की ओर देखने लगी। सखी बोल पड़ी – – हो गया भोले का अभिषेक। 🙏😊

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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