श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “फागुन और वसंत के दोहे”।)       

✍ जय प्रकाश के नवगीत # १३४ ☆ फागुन और वसंत के दोहे ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

महुआ के रस में पगा, आ पहुँचा ऋतुराज

टेढ़ी नाक पलाश ले, स्वागत करता आज।

पीर विचारी हो गई, ज्यों गरीब की आस

दुख के आगे कौन है, जो गाये मधुमास।

 *

कली-कली के होंठ से, टपक रहा मकरंद

भँवरों की हैं टोलियाँ, घूम रहीं स्वच्छंद ।

 *

फागुन के कालीन पर, सेमल के मनुहार

पीकर रस मकरंद के, कामदेव अवतार।

 *

फागुन रंग अबीर ले, आ पहुँचा है द्वार

सेमल टेसू कर रहे, रंगों का व्यापार।

 *

फागुन वाली हाट में, टेसू की दूकान

सेमल बाँटे मुफ्त में, रंग भरे पकवान।

 *

गुझिया खाओ भाँग की, लेकर हाथ गुलाल

फिर निकलो हुरयार बन, खूब करो भूचाल।

 *

महफ़िल रंग गुलाल की, छायी चारों ओर

कौन बड़ा हुरियार है, कौन बड़ा चितचोर।

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares
0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

0 Comments
Oldest
Newest Most Voted