डॉ कुंदन सिंह परिहार
(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय डॉ कुन्दन सिंह परिहार जी का साहित्य विशेषकर व्यंग्य एवं लघुकथाएं ई-अभिव्यक्ति के माध्यम से काफी पढ़ी एवं सराही जाती रही हैं। हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहते हैं। डॉ कुंदन सिंह परिहार जी की रचनाओं के पात्र हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं। उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय व्यंग्य – ‘वीआईपी और भगवान ‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३४१ ☆
☆ व्यंग्य ☆ वीआईपी और भगवान ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆
मंदिर में गहमागहमी थी। वीआईपी के आने की सूचना आ चुकी थी। सभी पुजारी उत्तेजना की स्थिति में थे। भारी चढ़ावे की उम्मीद थी। वीआईपी गेट पर विशिष्ट अतिथि का इंतज़ार हो रहा था। कुछ दूरी पर ‘जनता लाइन’ लगी थी, जिसमें सैकड़ों लोग कई घंटे से भगवान के दर्शन के लिए लाइन में लगे थे।
जल्दी ही वीआईपी का काफ़िला मंदिर में दाखिल हुआ। चार गाड़ियां मंदिर के प्रांगण में आ लगीं। आगे वाली में वीआईपी विराजमान थे, दूसरी गाड़ी में चमचे और भक्त, तीसरी में अंगरक्षक, और चौथी में कुछ फालतू सामान के साथ दो तीन सेवक और कैमरामैन।
प्रमुख पुजारी और अन्य पुजारियों ने तिलक लगाकर विशिष्ट जी और उनके काफ़िले का स्वागत किया। गद्गद् स्वर में बोले ‘आइए, पधारिए।’
वीआईपी ने कार से बाहर निकल कर ‘जनता लाइन’ पर हिकारत की नज़र डाली, फिर वे वीआईपी द्वार के सामने रखी पत्थर की बेंच पर पसर गये। बुदबुदाये— ‘बहुत थक गया। बहुत खराब रास्ता है।’
फिर वे प्रमुख पुजारी को संबोधित करके बोले, ‘हम भगवान के दर्शन करने के लिये आये हैं। आप जाकर भगवान को हमारे आने की इत्तिला दें और हमारी तरफ से उनसे प्रार्थना करें कि यहां दरवाजे तक आकर हमें दर्शन दें।’
सुनकर प्रमुख पुजारी सन्न रह गये। हकला कर बोले, ‘क्या कह रहे हैं? भगवान यहां आकर आपको दर्शन देंगे? कैसी बातें करते हैं?’
वीआईपी भवें चढ़ाकर बोले, ‘ठीक ही तो कह रहा हूं। भगवान हमेशा भक्त की पुकार पर आते रहे हैं। पचीसों उदाहरण हैं। तो फिर मेरी पुकार पर क्यों नहीं आएंगे? आप भीतर जाकर उन्हें इत्तिला तो कीजिए।’
प्रमुख पुजारी जी हैरत की स्थिति में भीतर प्रभु के सामने पहुंचे, हाथ जोड़कर बोले, ‘प्रभु, धृष्टता के लिए क्षमा करें। वह मंत्री प्रीतम लाल आया है। कहता है भगवान दुआरे तक जाकर उसे दर्शन दें।’
सुनकर प्रभु की त्योरियां चढ़ गयीं। बोले, ‘कैसा अशिष्ट है यह! यहां रोज हजारों भक्त आकर मेरे दर्शन करते हैं, और यह आदमी मुझे दर्शन देने के लिए बाहर बुला रहा है? ऐसा प्रस्ताव मुझ तक लाने का तुम्हें साहस कैसे हुआ?’
पुजारी जी हाथ जोड़कर दीन भाव से बोले, ‘क्षमा करें, प्रभु। यह आदमी बड़ा दुष्ट है। आप नहीं जाएंगे तो यह मेरी नौकरी खा जाएगा। फिर मैं आपकी सेवा के योग्य नहीं रहूंगा। कृपा करके दुआरे तक चले चलिए।’
भगवान ने थोड़ी देर तक सोचा, फिर वे अपने सिंहासन से उठकर धीरे-धीरे वीआईपी द्वार तक पहुंचे। वीआईपी महोदय ने उन्हें देखकर ‘प्रभु की जय हो’ का नारा लगाया और फिर उनके चरणों में लोट गये । लेटे-लेटे कनखियों से कैमरा वालों की तरफ देख रहे थे।
प्रभु को प्रणाम करने के बाद वीआईपी जी उठ कर हाथ जोड़कर बोले, ‘मेरा जनम सफल हुआ, प्रभु। मैं एक सोने के मुकुट की तुच्छ भेंट आपके लिए लाया हूं। उसे स्वीकार करने की कृपा कीजिएगा।’
प्रभु उनकी बात का कोई जवाब न देकर खिन्न भाव से मुड़कर भीतर चले गये। वीआईपी महोदय ‘जनता’ की ओर मुड़कर ऊंचे स्वर में बोले, ‘देखा? प्रभु हमें इतना चाहते हैं कि हमारी पुकार पर दौड़े चले आये। ऐसी कृपा भला कितने लोगों को मिलती है?’
इस प्रकार प्रभु के दर्शन पाकर और लाइन में लगी जनता को दर्शन देकर वीआईपी महोदय अपने लाव-लश्कर के साथ प्रस्थान कर गये।
© डॉ कुंदन सिंह परिहार
जबलपुर, मध्य प्रदेश
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈







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धन्यवाद, बिष्ट जी।