सुश्री मंजिरी “निधि”
(बड़ोदा से सुश्री मंजिरी “निधि” जी की गद्य एवं छंद विधा में विशेष अभिरुचि है और वे साथ ही एक सफल महिला उद्यमी भी हैं।
आज प्रस्तुत है आपका आलेख ‘समृद्ध संस्कृति की अद्भुत भूमि – ४‘।)
☆ मंजिरी साहित्य # १९ ☆
कविता – आलेख – समृद्ध संस्कृति की अद्भुत भूमि – ४ ☆ सुश्री मंजिरी “निधि”
कच्छ का रबारी समुदायl इनका काम पशुपालन होता हैl ये पुरुष रबारी, तन पर सफ़ेद केडियु और नीचे सफ़ेद सूती धोती पहनते हैं जो इनके शरीर को ठंडा रखते हैंl सर पर सफ़ेद या लाल रंग की पगड़ी जो धूप से बचाती है साथ ही विपत्ती में रस्सी भी बन जातीl कान में सोने की वेढ और गले में चांदी का कड़ा पहनते हैंl इनकी स्त्रियां कंजरी के साथ बहुत घेर वाला घाघरा जिस पर कांच के साथ का कच्छी भरत काम किया होता है वो पहनती हैंl सर सदैव काले या लाल रंग की ओढ़नी से ढका होता हैl ये अपने गले में चांदी की हंसली, कमर में कंडोरा और हाथों में हाथी दाँत के चूड़े पहने रहती हैंl
इनके पास इनके स्वयं के ऊँट, भेड़, गाय और भैंसे होती हैंl इनकी जीवन शैली घुमंती होती हैl रेगिस्तान में अपने पशुओं को ढूंढने हेतु इन्होने अपना जीपीएस बनाया कि ये रेत पर उकेरे पद चिन्हों को पढ लेते हैंl
पशुओं के तलवे का कौन सा हिस्सा रेत के अंदर गया है जिससे पशु के चलने की दिशा का अनुमान लगता हैl
इनको इस तरह पदचिन्हों को पढ़ने का बहुत अभ्यास हो गया हैl इतना कि आदमी के पैर की एड़ी और अंगूठे के रेत में धंसने से इन्हें मालूम होता था कि वह कितना भारी सामान लिये हैl रेत में धंसे क़दमों की दूरी नापकर उस व्यक्ति की लम्बाई बता देते हैंl रेत में धंसे पैरों के निशानों से पता चलता है कि आदमी जवान है या बूढाl पैरों के निशान से स्त्री, पुरुष, बच्चे का भी अनुमान लगा लेते हैंl पैरों के निशान से बता देते कि मानव है या पशु? कौन सी दिशा में कितने लोग, कितनी उम्र वाले, कितने वजन वाले और कितने वेग से गये हैंl
है ना अद्भुत भूमि सह अद्भुत लोग??
ये पगी दिन तो दिन पर रात के समय भी ये हाथ और पैरों से महसूस कर वो सारी बातें रात को भी बता देते हैंl
इनको तारों और नक्षत्रों की भी पूरी जानकारी होती हैl ध्रुव तारे की स्थिति देखकर ये चारों दिशाए बता देते हैंl नक्षत्रों को देखकर ये सही समय का भी पता बता देते हैंl
रेगिस्तान की अपनी एक अलग विशेषता होती है कि यहाँ दिन में रेत बहुत गर्म होती है और सूर्यास्त पश्चात बहुत जल्दी ठंडी भी हो जाती हैl यही कारण है कि रात में रेगिस्तान के ऊपर की हवा भारी और ठंडी होकर हाय प्रेशर बनाती है और वह कम प्रेशर वाली दिशा में बहती हैl इसीलिए अक्सर यहाँ रात को हवाएँ एक ही दिशा में चलती हैंl
ये पगी रात को सफर में निकलने से पहले थोड़ी सूखी रेत को हाथ में लेकर हवा में उड़ा देते हैंl रेत जिस दिशा में उड़ती उससे ये हवा का रुख पहचान लेते हैंl
रात के समय ये रेत में पड़े गड्ढे को छूतेl यदि अंगूठे से आगे को रेत धकेली होती तो वे समझ जाते कि मानव का पैर है या जानवर काl
आज भी यहाँ के बीएसएफ अपने देश को सावधान रखने हेतु साथ एक पगी जरूर रखते हैंl
☆
© सुश्री मंजिरी “निधि”
बड़ोदा, गुजरात
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





